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वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया

नहीं दे सकता है।

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इस प्रदेश में कुइआवेम नामक लोगों की एक और जति है। ये भारतीय व्यापारी हैं और यहां के मूल निवासी हैं। वे नायरों से भिन्न नहीं हैं, लेकिन वे अपनी एक त्रुटि के कारण उनसे अलग रहते हैं। उनका धंधा मिट्टी के बर्तन और राजमहलों तथा मंदिरों की छत के लिए ईंटें बनाना है, जिन पर खपरैल के स्थान पर इंटें बिछाई जाती हैं। मैं बता चुका हूं कि अन्य घरों की छतों पर टहनियां बिछाई जाती हैं। मूर्तिपूजा का उनका अपना अलग ढंग और अलग मूर्तियां होती हैं।

एक और मूर्तिपूजक जाति है, जिसे मेनाटोस कहते हैं। उनका धंधा है कि वे राजाओं, ब्राह्मणों तथा नायरों के कपड़े धोते हैं। उनकी गुजर-बसर का केवल एक यही धंधा है। अन्य कोई धंधा वे नहीं कर सकते।

एक और नीची जाति है, जिसे लोग केलेटिस कहते हैं। वे जुलाइे होते हैं। केवल यही उनकी रोजी-रोटी का साधन है। वे सूती तथा रेशमी कपड़े बुनते हैं। वे नीची जाति के लोग हैं। पैसा उनके पास नहीं होता। अतः वे नीची जातियों के लिए कपड़ा तैयार करते हैं। वे सबसे अलग-थलग हैं और उनका मूर्तिपूजा का अपना अलग ढंग है।

ऊपर वर्णित जातियों के अलावा उनसे निम्न स्तर की ग्यारह और जातियां हैं, जिनसे अन्य जातियां संबध नहीं रखती हैं और मृत्यु के भय से उनका स्पर्श भी नहीं करतीं। उनमें एक-दूसरे से भारी भिन्नताएं हैं, और वे एक-दूसरे से नहीं घुलती-मिलतीं। इन निम्न स्तर के सीधे-सादे लोगों में से सर्वाधिक शुद्ध को ‘तिय्या’ कहा जाता है। उनका मुख्य धंधा ताड़ की खेती करना है। वे उनके फल एकत्र करते हैं और उन्हें पीठ पर लादकर बेचने के लिए ले जाते हैं, क्योंकि इस प्रदेश में माल ढोने के लिए कोई सवारी नहीं होती।

इनमें भी निम्न स्तर की एक और जाति है, जिसे लोग मनान (मंकू) कहते हैं। वे दूसरों से न तो मेलजोल रखते हैं और न दूसरों को स्पर्श करते हैं, और न ही दूसरे उन्हें स्पर्श करते हैं। वे आम लोगों के धोबी होते हैं और सोने के लिए चटाइयां बुनते हैं। उनके अलावा अन्य लोग ये धंधे नहीं कर सकते। हारकर उनके पुत्रों को भी वही धंधा अपनाना होगा। उनकी अपनी अलग मूर्तिपूजा- प्रणाली है।

इनमें भी निम्न स्तर की एक और जाति है, जिसे वे कानाकुस कहते हैं। वे बक्सुए और छतरियां बनाते हैं। ज्योतिष विद्या के लिए वे अक्षर ज्ञान प्राप्त करते