वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
केवल यही धंधा करते हैं।
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इनमें भी निम्न स्तर की और असभ्य एक और जाति है, जिसे रेवोलीन कहते हैं। वे बड़े ही गरीब होते हैं। वे बस्ती में बेचने के लिए घास और जलाने के लिए लकड़ी ले जाते हैं। न तो वे किसी को स्पर्श करते हैं और न ही मृत्यु के भय से उन्हें कोई स्पर्श करता है। वे नंगे रहते हैं। वे अपने गुप्तांगों को गंदे चिथड़ों, अधिकांशतः पेड़ों की पत्तियों से ढांपे रहते हैं। उनकी स्त्रियां अपने कानों में पीतल की अनेक बालियों पहनती हैं। वे अपनी गर्दन, बांहों और पैरों में मनकों की कंठी और कंगन पहनती हैं।
इनसे भी निम्न स्तर की और असभ्य एक और जाति है, जिसे लोग पुलय कहते हैं। वे मूर्तिपूजक होते हैं। वे औरों की भांति ही अन्त्यज और बहिष्कृत समझे जाते हैं। वे खेती में या खोह-खंदकों में रहते हैं, हां सभ्य जाति के लोग कभी भूले-भटके ही जाते हैं। वे बड़ी ही छोटी-मोटी झोपडि़यों में रहते हैं। वे भैंसों तथा बैलों की मदद से धान के खेत जोतते हैं। वे नायरों से दूर रहकर ही बात करते हैं और इतनी जोर से चिल्लाते हैं कि उन्हें सुना जा सके। जब वे सड़कों पर चलते हैं तो वे वे जोर-जोर से चिल्लाते हैं, ताकि उनके लिए रास्ता छोड़ दिया जाए और जो भी उनकी आवाज सुन ले, वह सड़क से हट जाए और उनके वहां से गुजरने तक वृक्षों की ओट में खड़ा हो जाए। यदि कोई स्त्री-पुरुष उन्हें छू लेता है तो जिसको स्पर्श किया जाए, उस व्यक्ति को कत्ल कर देता है। अतः प्रतिशोध में वे पुल्लयन को कत्ल कर देते हैं और उन्हें कोई दंड नहीं भोगना पड़ता।
इनसे भी दीन-हीन एक और जाति होती है। इस जाति के लोगों को परयन कहते हैं। वे अन्य सभी जातियों से दूर अलग-थलग अति निर्जन स्थानों में रहते हैं। न वे किसी अन्य व्यक्ति से और न ही कोई अन्य व्यक्ति उनसे संबंध रखता है। उन्हें शैतान से भी बदतर और प्रताड़नीय समझा जाता है। उन्हें देखने मात्र से ही आदमी अपवित्र और जाति-बहिष्कृत हो जाता है। वे रतालू और अन्य जंगली कंद-मूल खाते हैं। वे अपने तन के मध्य भाग को पत्तियों से ढांपते हैं। वे जंगली पशुओं का मांस भी खाते हैं।
मूर्तिपूजकों के बीच जाति-भेद की इतनी ही कथा है। कुल मिलाकर ये अठारह जातियां हैं। वे सब अलग-अलग हैं। न वे आपस में एक-दूसरे को छू सकती हैं और न ही शादी-विवाह कर सकती हैं। मलाबार की जिन अठारह मूर्तिपूजक जातियों का मैंने अभी वर्णन किया है, इनके अलावा मूल निवासी के रूप में कुछ अन्य लोग भी हैं, जो बाहर से आए हैं। ये व्यापारी और साहूकार