2. वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया - Page 55

40 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लोग हैं। उनके अपने-अपने मकान और अपनी जागीरें हैं। वे मूल निवासियों की

भांति रहते हैं, पर उनके रीति-रिवाज अलग होते हैं।

इन विदेशियों ने जाति की पूरी और ब्यौरेवार कोई तस्वीर पेश नहीं की है। वे इसमें असमर्थ रहे हैं। इसका कारण यह है कि हर विदेशी के लिए हिंदू का निजी जीवन प्रच्छन्न रहता है और उसके लिए उसके भीतर झांकना संभव भी नहीं है। इसके अलावा भारत का सामाजिक ताना-बाना, उसकी गतिविधि सदा से रीति-रिवाजों पर आधारित रही है। यह स्थान-भेद के अनुसार भी बदलती रहती है। उसकी जटिलता देखकर माथा चकराने लगता हे। उसके पीछे कोई कानूनी सूत्र नहीं होता, जिसे किसी कानूनी पाठ्य-पुस्तक मे से खोजकर निकाला जा सके। लेकिन निस्संदेह ही विदेशियों को ऐसा लगा कि जाति भारतीय समाज का एक सर्वाधिक अनोखा और इसलिए एक विशिष्ट गुण है। अन्यथा वे जब भारत आए और उन्होंने जो देखा, अपने विवरणों में उन्होंने जाति के अस्तित्व को नोट न किया होता।

अतः हिंदू समाज-संगठन मे जाति की एक विशिष्टता है, जो हिंदुओं को अन्यों से अलग करती है। जाति एक वर्धमान संस्था रही है। वह सदा-सर्वदा ज्यों की त्यों नहीं रही। मेगस्थनीज ने जब अपना विवरण लिखा, उस समय जाति का जो स्वरूप था, वह अलबरूनी के आगमन-काल से बहुत भिन्न था। पुर्तगालियों को जाति को जो स्वरूप दीख पड़ा, वह अलबरूनी के काल से भिन्न था। लेकिन जाति को समझने के लिए हमें उसकी प्रकृति के विषय में और अधिक सटीक जानकारी प्राप्त करनी होगी, जितनी कि हमें इन विदेशियों के वर्णन से मिलती है।

जाति विषयक चर्चा को समझने के लिए पाठकों को उन कुछ बुनियादी संकल्पनाओं से परिचित कराना आवश्यक है, जो हिंदू समाज-संगठन में निहित है। हिंदुओं में प्रचलित समाज-संगठन की मूल संकल्पना उस वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति से प्रारंभ होती है, जिसके बारे में विश्वास किया जाता है कि उससे हिंदू समाज का विभाजन हुआ। ये चार वर्ण हैंः (1) ब्राह्मण, पुजारी और शिक्षित वर्ग, (2) क्षत्रिय, सैनिक वर्ग, (3) वैश्य, व्यापारी वर्ग, और (4) शूद्र, दास वर्ग। कुछ काल तक वे केवल वर्ग थे। कुछ काल बाद जो केवल वर्ग (वर्ण) थे, वे जातियां बन गईं। चार जातियां चार हजार जातियां बन गईं। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ण-व्यवस्था का ही विकसित रूप है।

निस्संदेह जाति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था का ही विकसित रूप है, लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अध्ययन से हम जाति-व्यवस्था की कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। जाति का अध्ययन वर्ण को अलग रखकर करना होगा।