वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
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II
कहा जाता है कि किसी प्राचीन नास्तिक ने अपने दर्शन की व्याख्या करने के बाद अंत में कहा थाः
मैं केवल यह जानता हूं कि मैं कुछ भी नहीं जानता, और मैं पूरे विश्वास
से यह भी नहीं कह सकता कि मैं यह जानता भी हूं।
सर डेंजिल इबट्सन ने पंजाब की जाति-व्यवस्था के बारे में लिखते हुए कहा कि इस नास्तिक ने अपने बारे में ऊपर जो कुछ कहा है, यही शब्द जाति के बारे में मेरी अपनी धारणा को भी व्यक्त करते हैं। सच तो यह है कि स्थानीय परिस्थितियों के कारण जाति की अवधारणा में अत्यधिक अंतर मिलता है। किसी एक स्थान पर उपलब्ध किसी जाति के बारे मे पूर्ण दृढ़ता से कोई बात कहतना अति कठिन है, क्योंकि किसी अन्य स्थान पर उपलब्ध उसी जाति के बारे में उक्त तथ्य का उतनी ही दृढ़ता से खंडन किया जा सकता है।
भले ही यह बात सच हो, फिर भी जाति के आवश्यक और मूल लक्षणों और उसके अनावश्यक और सतही लक्षणों की अलग-अलग करना कठिन नहीं है। किसी व्यक्ति का किन कारणों से बहिष्कार किया जा सकता है, इसे निश्चित करने का आसान तरीका श्री भट्टाचार्य ने इस प्रकार बताया है, इसे निश्चित जाति से बहिष्कार के निम्न कारण गिनाए हैंः (1) ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेना, (2) यूरोप अथवा अमरीका की यात्रा करना, (3) विधवा से विवाह करना, (4) यज्ञोपवीत को
खुल्लम-खुल्ला उतार फेंक देना, (5) खुल्लम-खुल्ला गोमांस या सुअर का मांस
खाना, (6) खुल्लम-खुल्ला मुसलमान, ईसाई और छोटी जाति के हिंदू के हाथ का बना कच्चा भोजन करना, (7) अति निम्न जाति के शूद्र के घर पर काम करना, (8) अनैतिक प्रयोजन से किसी महिला का घर से बाहर जाना, और (9) विधवा का गर्भवती हो जाना। यह सूची पूर्ण नहीं है और उसमें जाति से बहिष्कार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण छोड़ दिए गए हैं। वे हैंः (10) अंतर्जातीय विवाह करना, (11) दूसरी जाति के व्यक्ति के साथ खान-पान करना, और (12) व्यवसाय बदलना। श्री भट्टाचार्य के कथन का दूसरा दोष यह है कि उसमें आवश्यक और अनावश्यक कारणों में कोई भेद नहीं किय गया है। इसमें शक नहीं है कि जब किसी व्यक्ति का जाति से बहिष्कार किया जाता है तो दंड एक समान होता है। उसके दोस्त, रिश्तेदार और जाति-भाई उसका आतिथ्य नहीं ग्रहण करते। उसे उनके घरों में उत्सवों में नहीं बुलाया जाता। वह अपने बच्चों के विवाह नहीं कर सकता। उसकी विवाहित पुत्रियां भी जाति से बहिष्कृत होने के भय से उससे मिलने नहीं आ सकतीं। पुरोहित, नाई