2. वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया - Page 57

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और धोबी उसके घर नहीं जाते। उसके जाति-भाई उससे इस हद तक संबंध तोड़ लेते हैं कि उसके घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर वे अंत्येष्टि में नहीं जाते। कभी-कभी तो जाति से बहिष्कृत व्यक्ति को सार्वजनिक मंदिरों और श्मशान में भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

जाति से बहिष्कार के ये कारण जाति के नियमों को परोक्ष रूप से दर्शाते हैं। लेकिन सभी विनियम बुनियादी नहीं होते। अनेक विनियम अनावश्यक होते हैं। आवश्यक और अनावश्यक में भेद एक अन्य प्रश्न द्वारा किया जा सकता है। वह है कि जाति से बहिष्कृत हिदू पुनः जाति में कब शामिल हो सकता है? हिंदुओं में प्रायश्चित करने की पद्धति है। जात से बहिष्कृत व्यक्ति को पहले प्रायश्चित करना होगा, उसके बाद ही वह पुनः जाति-बिरादरी में शामिल हो सकता है। इन प्रायश्चितों के बारे में कुछ बातें याद रखनी होंगी। सर्वप्रथम तो यह कि जाति संबंधी कुछ अपराध ऐसे हैं, जिनके लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। दूसरी यह है कि अपराध के अनुसार प्रायश्चित बदल जाते हैं। कुछ अपराधों में तो प्रायश्चित के रूप में बहुत हल्का-सा जुर्माना होता है। अन्य अपराधों में जुर्माना अति कठोर हो सकता है।

प्रायश्चित का होना या न होना महत्व रखता है और उसे साफ तौर पर समझना होगा। प्रायश्चित न होने का अर्थ यह नहीं होता कि अपराध करने पर दंड नहीं मिलेगा। इसके विपरीत उसका अर्थ होता है कि अपराध अक्षम्य है और जिस अपराधी को एक बार जाति से निकाल दिया जाएगा, उसका कभी भी पुनः उद्धार नहीं होगा। उसे पुनः कभी जाति में शामिल नहीं किया जाएगा। प्रायश्चित होने का अर्थ है कि अपराध क्षम्य है। अपराधी प्रायश्चित कर सकता है और बहिष्कृत व्यक्ति जाति में पुनः शामिल हो सकता है।

दो अपराधों के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है। वे हैंः (1) हिंदू धर्म को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लेना, और (2) दूसरी जाति अथवा धर्म के व्यक्ति से शादी कर लेना। जाहिर है कि यदि इन अपराधों के लिए कोई व्यक्ति जाति से बाहर कर दिया जाता है तो वह सदा के लिए जाति से बाहर हो जाता है।

जिन दो अपराधों के लिए कठोरतम प्रायश्चित का विधान है, वे हैंः (1) किसी दूसरी जाति के व्यक्ति और किसी अहिंदू के साथ खान-पान करना, और (2) जातीय व्यवसाय को छोड़कर कोई दूसरा व्यवसाय अपनाना। अन्य अपराधों के लिए दंड हल्का है या यू कहें कि प्रायः नाममात्र का है।

जाति के बुनियादी नियम क्या हैं और जाति का रूप-स्वरूप क्या है, इस पहेली को बूझने का सर्वाधिक निश्चित अता-पता प्रायश्चित संबंधी नियम देते हैं। जिन नियमों के उल्लंघन के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है, उन्हें जाति की ‘आत्मा’ कहा जा सकता