44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तो संगठित होते हैं या फिर असंगठित होते हैं। जब वर्ग की सदस्यता और वर्ग में शामिल होने या उनसे अलग होने की प्रक्रिया निश्चित सामाजिक नियम बन जाती है और वर्ग के अन्य सदस्यों के संदर्भ में उनमें कतिपय कर्तव्यों तथा विशेषाधिकारों का समावेश हो जाता है, तो वर्ग एक संगठित वर्ग बन जाता है। प्रत्येक वर्ग एक स्वैच्छिक वर्ग होता है और उसमें जब सदस्य शामिल होते हैं तो उन्हें इस बार का पूरा-पूरा ज्ञान होता है कि वे क्या कर रहे हैं और संगठन के लक्ष्य क्या हैं। दूसरी ओर ऐसे वर्ग होते हैं, जिसमें कोई व्यक्ति शामिल तो हो जाता है, पर अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग नहीं करता और ऐसे सामाजिक विनियमों तथा परंपराओं का दास हो जाता है, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता।
इस प्रकार जाति एक अति संगठित सामाजिक वर्गीकरण है। यह कोई असंगठित अथवा हल्का-फुल्का निकाय नहीं है। इसी प्रकार जाति कोई ऐसा वर्गीकरण नहीं है, जो स्वैच्छाश्रित हो। हिंदुओं में व्यक्ति जाति में जन्म लेता है और मरने पर भी उसी जाति का बना रहता है। ऐसा कोई हिंदू नहीं, जिसकी कोई जाति न हो। जाति से उसका कोई छुटकारा नहीं। जन्म से मृत्यु तक जाति से बंधे रहने के कारण वह अपनी जाति के ऐसे नियमों तथा रूढि़यों के अधीन रहता है, जिन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता।
प्रत्येक जाति के लिए अलग नाम होने का महत्व यह है कि उसके कारण जाति एक संगठित और अनिवार्य वर्ग बन जाती है। विशिष्ट नाम होने के कारण जाति एक निकाय बन जाती है, उसका स्थाई अस्तित्व हो जाता है और वह एक स्वतंत्र इकाई हो जाती है। जिन विद्वानों ने जाति पर लिखा-पढ़ा है, उन्होंने जातियों के अपने-अपने नामों के महत्व को भली-भांति हृदयंगम नहीं किया है। इस प्रकार उन्होंने जाति पर आधारित उन सामाजिक वगो्रं के एक अति विशिष्अ लक्षण को नजरअंदाज कर दिया है। इस प्रकार के सामाजिक वर्ग हर समाज में हैं और उनका होना अस्वाभाविक नहीं। बहुत से देशों के विभिन्न सामाजिक वर्गों की तुलना भारत की विभिन्न जातियों से की जा सकती है और उन्हें समकक्ष कहा जा सकता है। कुम्हार, धोबी, विद्वान जैसे सामाजिक वर्ग सर्वत्र पाए जाते हैं। लेकिन अन्य देशों में वे असंगठित तथा स्वैच्छिक वर्ग हैं, जब कि भारत में वे संगठित और अनिवार्य बन गए हैं, उन्होंने जातियों का रूप ले लिया है। अन्य देशों में समाज के वर्गों को विशिष्ट नाम नहीं दिया गया, जब कि भारत में ऐसा किया गया है। जाति पर नाम की जो मोहर लगा दी गई है, वह उसे स्थिरता, निरंतरता और विशिष्टता प्रदान करती है। नाम ही यह स्पष्ट करता है कि कौन लोग उसके सदस्य हैं और अधिकांशतः जो व्यक्ति जिस जाति में पैदा होता है, वह अपने नाम के आगे अपनी जाति का नाम जोड़ता है। विशिष्ट नाम होने