46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है। कुछ को अनुमति है कि वे कतिपय संस्कार कर सकें। कुछ को अनुमति नहीं है कि वे कुछ संस्कार कर सकें। यथा उपनयन संस्कार को ही लें। कुछ जातियां उस पवित्र धागे को धारण नहीं कर सकतीं। संस्कार कर्म संबंधी अधिकार में भी पूर्वता क्रम चलता है। जो जाति समूचे संस्कार कर सकती है, उसकी हैसियत उस जाति से ऊंची होगी, जो केवल कुछ संस्कार कर सकती है।
अब मंत्रों को लें। वे भी पूर्वता संबंधी नियमों के उद्गम हैं। हिंदू धर्म के अनुसार एक ही संस्कार की तीन रीतियों से किया जा सकता हैः (1) वेदोक्त रीति से, (2) शास्त्रोक्त रीति से, और (3) पुराणोक्त रीति से। वेदोक्ति रीति में संस्कार वैदिक मंत्रों से किया जाता है। शास्त्रोक्त रीति में संस्कार शास्त्रीय मंत्रों से किया जाता है। पुराणोक्त रीति में संस्कार पौराणिक मंत्रों से किया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों की तीन विशिष्ट श्रेणियां हैंः (1) चार वेद, (2) छह शास्त्र, और (3) अठारह पुराण। भले ही वे धर्मग्रंथ कहलाते हैं, पर उनकी मान्यता एक-सी नहीं होती। वेदों को सर्वोच्च मान्यता है। मान्यता की दृष्टि से शास्त्रों का नंबर दूसरा है और सबसे निम्न मान्यता पुराणों की है। मंत्र किस प्रकार का सामाजिक पूर्वता को जन्म देते हैं, वह स्पष्ट हो जाएगा, यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि हर जात को वेदोक्त रीति से संस्कार करने का अधिकार नहीं है। तीन जातियां सोलह में से किसी एक संस्कार को करने का अधिकार कर सकती हैं। लेकिन व्यवस्था है कि एक उसे वेदोक्त रीति से, दूसरी उसे शास्त्रोक्त रीति से और तीसरी उसे पुराणोक्त रीति से ही कर सकती है। पूर्वता क्रम का निर्धारण वह मंत्र करता है, जिसके प्रयोग का अधिकार किसी जाति को धार्मिक संस्कार के लिए है। जो जाति वैदिक मंत्र के प्रयोग की अधिकारी है, वह शास्त्रीय मंत्र का प्रयोग करने वाली जाति से ऊंची है। जो जाति शास्त्रीय मंत्र का प्रयोग करने की अधिकारी है, वह पुराणोक्त मंत्र का प्रयोग करने वाली जाती से ऊंची है।
हिंदू धर्म से जुड़े पूर्वता क्रम का तीसरा स्रोत है, पुजारी। धर्म अपेक्षा करता है कि यदि धार्मिक संस्कार का पूरा-पूरा लाभ प्रदान करना है तो उसे पुजारी के माध्यम से ही प्राप्त करना होगा। धर्मग्रंथों ने पुजारी के रूप में ब्राह्मण को नियुक्त किया है। अतः ब्राह्मण के बिना काम नहीं चल सकता। लेकिन धर्मग्रंथ यह अपेक्षा नहीं रखते कि किसी भी जाति का कोई भी हिंदू यदि ब्राह्मण को धार्मिक संस्कार में यजमानी के लिए बुलाए तो उसे वह स्वीकार करेगा ही। किस जाति के निमंत्रण को वह स्वीकार करे या न करे, यह बात ब्राह्मण की इच्छा पर छोड़ दी गई है। लंबी तथा सुस्थापित प्रथा द्वारा यह बात ब्राह्मण की इच्छा पर छोड़ दी गई है। लंबी तथा सुस्थापित प्रथा द्वारा अब यह तय कर दिया गया है कि किस जाति का निमंत्रण वह स्वीकार करेगा