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वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया

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और किस का नहीं करेगा। यह तथ्य जातियों के बीच पूर्वता का आधार बन गया है। जिस जाति की यजमानी ब्राह्मण करेगा, वह उस जाति से ऊंची होगी, जिसकी वह यजमानी नहीं करेगा।

पूर्वता के नियमों का दूसरो स्रोत है, सहभोज। इस ओर ध्यान देना होगा कि सहभोज के नियमों की भांति विवाह के नियमों ने पूर्वता के नियमों को जन्म नहीं दिया है। इसका कारण यह है कि अंतर्विवाह और सहभोज की वर्जना करने वाले नियमों में विभेद है। अंतर प्रत्यक्ष है। अंतर्विवाह संबंधी वर्जना ऐसी है कि उसका न केवल आदर किया जाना चाहिए, बल्कि अति कठोरता से उसका पालन भी किया जाना चाहिए, लेकिन सहभोज की वर्जना मुश्किलें उत्पन्न करती है। सभी स्थानों पर और सभी परिस्थितियों में उसका अति कठोरता से पालन नहीं किया जा सकता। आदमी बाहर निकलता है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर उसे जाना ही होगा। हो सकता है कि जहां-जहां वह जाए, वहां-वहां उसके जाति-भाई न हों। हो सकता है कि वह अजनबियों के बीच फंस जाए। विवाह तो टाला जा सकता है, भोजन को नहीं। विवाह के लिए तब तक प्रतीक्षा की जा सकती है, जब तक वह जाति-भाइयों के समाज में न लौट जाए। लेकिन भोजन के मामलें में वह प्रतीक्षा नहीं कर सकता। भोजन तो कहीं से भी, किसी से भी प्राप्त करना ही होगा। सवाल उठता है कि यदि प्राप्त करना ही है तो वह किस जाति से प्राप्त करे। नियम है कि वह अपने से ऊंची जाति से भोजन प्राप्त करेगा, लेकिन अपनों से नीति जाति से प्राप्त नहीं करेगा। इस निर्णय के बारे में पता करने के लिए कोई उपाय नहीं है कि कैसे यह निर्णय किया गया कि कोई हिन्दू एक जाति से भोजन प्राप्त कर सकता है, दूसरी से नहीं। पूर्वोदाहरणों की लंबी परंपरा से हर हिंदू जानता है कि किस जाति के वह भोजन प्राप्त कर सकता है, और किससे नहीं। मुख्यतः इसका फैसला ब्राह्मणों से नियम करते हैं। जिस जाति से ब्राह्मण भोजन लेता है, वह ऊंची होती है, जिससे वह नहीं लेता, वह नीची होती है। खान-पान के बारे में ब्राह्मणों के नियम विशद् हैंः (1) वह कुछ से ही पानी लेगा और किन्हीं अन्य से नहीं, (2) ब्राह्मण किसी जाति से ऐसा भोजन नहीं लेगा, जो पानी में पकाया गया हो, और (3) कुछ जातियों से वह केवल तेल में छोंका गया भोजन लेगा। पुनः बर्तन के मामले में भी उसके नियम हैं। उसी के अनुसार वह भोजन तथा पानी ग्रहण करेगा। कुछ जातियों से वह मिट्टी के बर्तन में भोजन अथवा पानी ग्रहण करेगा, कुछ से वहकेवल धातु के बर्तन में और कुछ से वह केवल कांच के बर्तन में ग्रहण करेगा। इससे भी जाति के स्तर का निर्धारण होता है। यदि वह किसी जाति से तेल में छोंका गया भोजन ग्रहण करता है तो उसका दर्जा उस जाति से ऊंचा होता है, जिससे वह ग्रहण नहीं करता। जिस जाति से वह