2. वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया - Page 63

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जल ग्रहण करता है, वह उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह जल ग्रहण नहीं करता। यदि वह धातु के बर्तन में जल ग्रहण करता है तो वह जाति उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह मिट्टी के बर्तन में जल ग्रहण करेगा। जिस जाति से वह मिट्टी के बर्तन में जल ग्रहण करेगा वह उस जाति से ऊंची होती है, जिससे वह कांच के बर्तन में जल ग्रहण करेगा। कांच एक ऐसा तत्व है, जिसे निर्लेप’ (निर्दोष) कहते हैं। अतः उसमें ब्राह्मण सबसे नीति जाति से भी पानी ग्रहण कर सकता है। लेकिन अन्य धातुएं दोष ग्रहण करती हैं। दोष ग्राह्यता भी उपयोग करने वाले व्यक्ति के दर्जे पर निर्भर करती है। यह बर्तन में जल ग्रहण करने की ब्राह्मण की इच्छा पर निर्भर करता है।

ये कुछ ऐसी बातें हैं, जो परंपरा क्रम वाली इस हिंदू जाति-व्यवस्था में जाति का स्थान और दर्जा निर्धारित करती हैं।

ऐसी है जाति और ऐसी है जाति व्यवस्था। सवाल यह है कि हिंदू समाज-संगठन को जानने के लिए क्या इतनी जानकारी पर्याप्त है? हिंदू समाज-संगठन के रूढ़ स्वरूप को समझने के लिए जाति और जाति-व्यवस्था का ज्ञान पर्याप्त है। हमें इन तथ्यों से अधिक की जानकारी आवश्यक नहीं कि हिंदू जातियों में बंटे हैं और जातियां ऐसी व्यवस्था का गठन करती हैं, जिसमें सब एक ऐसे धागे पर टंगे रहते हैं, जो व्यवस्था में इस प्रकार पिरोया जाता है कि एक जाति को दूसरी जाति से लपेटते और अलग करते समय वह उन्हें इस प्रकार धारण करे, जैसे वह टेनिस की ऐसी गेंदों की माला हो, जो एक-दूसरे के ऊपर टंगी हो। लेकिन जाति के चेतन स्वरूप को समझने के लिए इतना पर्याप्त नहीं होगा। जाति के ढांचे के मूर्त रूप को समझने के लिए जाति-व्यवस्था के अलावा जाति के एक अन्य विशिष्ट लक्षण पर ध्यान देना जरूरी है और वह है, वर्ग व जाति-व्यवस्था।

जाति और वर्ग की धारणाओं का आपसी रिश्ता दिलचस्प विवाद का विषय रहा है। कुछ कहते हैं कि जाति और वर्ग, दोनों एक जैसे हैं और दोनों में कोई भेद नहीं है। पर कुछ अन्य कहते हैं कि जाति की संकल्पना वर्ग की संकल्पना के मूलतः प्रतिकूल है। जाति के इस पहलू के बारे में अब आगे और प्रकाश डाला जाएगा। फिलहाल जाति-व्यवस्था के उस प्रमुख लक्षण पर जोर देना जरूरी है, जिसका उल्लेख इससे पूर्व नहीं किया गया है। वह यह हैः यद्यपि जाति की धारणा वर्ग-धारणा से भिन्न और उसके प्रतिकूल है, फिर भी जाति से भिन्न जाति-व्यवस्था एक ऐसी वर्ग-व्यवस्था को मान्यता देती है, जो उपरोक्त क्रमबद्ध दर्जे से कुछ भिन्न है। जिस प्रकार हिंदू अनेक जातियों में बंटे हुए हैं, उसी प्रकार जातियां भी विभिन्न वर्गों में बंटी हुई हैं। हिंदू में जाति-भावना होती है। उसमें वर्ग-भावना भी होती है। उसमें जाति-भावना या