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वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया

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वर्ग-भावना इस बात पर निर्भर करती है कि उसका टकराव किस जाति से होता है। जिस जाति से उसका टकराव होता है, यदि वह उसके वर्ग की ही जाति है, तो उसमें अपनी जाति-श्रेष्ठता की भावना होती है। यदि जाति उसके वर्ग के बाहर की होती है तो उसमें वर्ग-श्रेष्ठता आ जाती है। इस बारे में यदि कोई प्रमाण चाहता है तो वह मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी में गैर-ब्राह्मणों के आंदोलन का अध्ययन कर सकता है। ऐसे अध्ययन से कोई संशय नहीं रह जाएगा कि हिंदू के लिए जाति की परिधि, वर्ग परिधि जैसी ही यथार्थ है और जाति-उच्चता, वर्ग-उच्चता जैसी ही यथार्थ है।

कहा जाता है कि जाति वर्ग-व्यवस्था का विकसित रूप है। आगे मैं यह सिद्ध करूंगा कि यह निरी बकवास है। जाति वर्ण का विकृत रूप है, जो भी हो, यह विकास विपरीत दिशा में हुआ है। लेकिन जहां जाति ने वर्ण-व्यवस्था को पूर्णतः विकृत कर दिया है, वहां उसने वर्ण-व्यवस्था से वर्ग-व्यवस्था उधार ले ली है। वास्तव में वर्ग, जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था के वर्ग-विभेदों का बहुत कुछ अनुसरण करती है।

यदि जाति-व्यवस्था पर इस दृष्टिकोण से विचार करें तो हमें अनेक वर्ग मिलेंगे, जो जाति-व्यवस्था के इस पिरामिड में बड़े-बड़े शिला खंडों की तरहत आर-पार एक के ऊपर एक व्यवस्थित हैं। पहला वर्ग उस व्यवस्था का है, जिसे चातुर्वर्ण्य कहा जाता है। चातुर्वर्ण्य की प्राचीन व्यवस्था में प्रथम तीन वर्णों अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को एक वर्ग तथा चौथे वर्ण अर्थात् शूद्र को दूसरे वर्ग में रखकर दोनों के बीच अंतर मिलता है। प्रथम तीन वर्गों को द्विज वर्ग माना गया है। शूद्र को द्विज वर्ग नहीं माना गया। विभेद का आधार यह है कि प्रथम तीन को यज्ञोपवीत धारण करने और वेद के अध्ययन का अधिकार है। शूद्र को दोनों में से कोई भी अधिकार नहीं है। इसी कारण उसे द्विज वर्ग में नहीं माना गया। यह अंतर अब भी है। यह वर्तमान वर्ग-भेद का आधार है। उसने जातियों को दो वर्गों में बांट दिया है। एक वर्ग वह है, जो शूद्रों के विशाल वर्ग से जन्मा है और दूसरा वर्ग वह है, जो ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों के तीन वर्गों से पैदा हुआ है। वर्ग-भेद की यही परतें उच्च जाति और निम्न जाति कही जाती हैं, और जो उच्च वर्ण की जाति तथा निम्न वर्ण की जाति के क्रमशः लघु रूप हैं

इस पिरामिड में चट्टान की एक परत और है। यह चतुर्थ वर्ण की जाति के ठीक नीचे स्थित है। यह परत चार वर्णों अर्थात् पहले तीन अर्थात् ऊंची जाति तथा चतुर्थ वर्ण से अर्थात् नीति जाति से उत्पन्न सभी जातियों के बाद की जातियों की परत है, जिन्हें मैं अवशिष्ट कहता हूं। यह अपने से ऊपर वाली परत की जातियों को उच्च मानती है। यह भी एक वास्तविक परत है। यह उस सुपरिभाषित विभेद का अनुसरण करती है, जो चातुर्वर्ण्य का मूल सिद्धांत था। जैसा कि बताया गया है, चातुर्वर्ण्य ने