50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चार वर्णों के बीच विभेद किया। उसने तीन वर्णों को चौथे से उच्च माना। लेकिन उसने वैसा ही स्पष्ट विभेद उन जातियों के बीच किया, जो चातुर्वर्ण्य के भीतर और जो चातुर्वर्ण्य के बाहर थीं। इस विभेद को व्यक्त करने के लिए उसके पास शब्दावली थी। जो चातुर्वर्ण्य के भीतर थे, चाहे उच्च थे या नीच, ब्राह्मण थे अथवा शूद्र, वे सवर्ण कहलाए अर्थात् उन पर वर्ण की मुहर नहीं लगी थी। चारों वर्णों से उत्पन्न जातियों को सवर्ण हिंदू कहा जाता है। अंग्रेजी मे उसे ‘कास्ट हिंदूज’ कहा जाता है। ‘शेष’ अवर्ण हैं, जिन्हें आजकल यूरोपीय ‘नान-कास्ट हिंदूज’ कहते हैं, यानी वे जो चार मूल जातियों अथवा वर्णों से बाहर हैं।
जाति-व्यवस्था के बारे में जो अधिकतर लिखा-पढ़ा गया है, उसका संबंध अधिकांशतः सवर्ण हिंदुओं की जाति-व्यवस्था से है। अवर्ण हिंदुओं के बारे में बहुत थोड़ी जानकारी है। ये अवर्ण हिंदू कौन हैं, हिंदू समाज में उनका क्या स्थान है, सवर्ण हिंदुओं से उनका क्या संबंध है, ये ऐसे प्रश्न हैं, जिनकी ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है। मेरा विश्वास है कि इन प्रश्नों का विचार किए बिना हमें हिंदुओं द्वारा बनाए गए सामाजिक ढांचे की सही तस्वीर नहीं मिल सकती। सवर्ण हिंदुओं तथा अवर्ण हिंदुओं के बीच के वर्ग-विभेद को निकाल देना, ग्रिम की परी कथा में से डाइनों, बैतालों और राक्षकों के वर्णन को निकाल देना जैसा है।
अवर्ण हिंदुओं के तीन भाग हैंः (1) आदिम जातियां, (2) जरायम-पेशा जातियां, और (3) अस्पृश्य जातियां। इन तीनों जातियों के लोगों की संख्या किसी भी प्रकार थोड़ी नहीं कही जा सकती। 1931 की जनगणना के अनुसार भारत में आदिम जातियों के लोगों की संख्या ढाई करोड़ बताई गई है। जरायम-पेशा के रूप में अनुसूचित लोगों की कुल आबादी कोई 45 लाख के लगभग है। 1931 में अस्पृश्यों की कुल आबादी कोई पांच करोड़ थी। इन तीनों की कुल संख्या सात करोड़ 95 लाख होती है।
सवर्ण जातियों के साथ अवर्ण जातियों का क्या संबंध है? सवर्ण जातियों तथा अवर्ण जातियों के बीच विभेद एक-सा नहीं है। अतः इस अंतर को आसानी से नहीं समझा जा सकता। सवर्ण जातियों तथा दो अवर्ण जातियों अर्थात् आदिम जातियों और जरायम-पेशा जातियों के बीच जो संबंध है, वह उस संबंध से भिन्न है जो सवर्ण जातियों तथा तीसरी अंतिम अवर्ण जातियों अर्थात् अस्पृश्यों के बीच है। सवर्ण जातियों तथा प्रथम दो अवर्ण जातियों के बीच विभेद जाति-भाई तथा मित्रों जैसा है। दोनों के बीच मैत्रीपूर्ण तथा सम्मानजनक शर्तों पर संपर्क संभव है। सर्वण जातियों तथा अस्पृश्यों के बीच विभेद भिन्न प्रकार का है। यह दो विजातीय तथा विरोधी समूहों के बीच का विभेद है। वहां सम्मानजनक शर्तों पर मैत्रीपूर्ण संपर्क की कोई संभावना नहीं है।