वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
51
इस विभेद का क्या महत्व है? इसका आधार क्या है? भले ही विभेद निश्चित है, पर उसके आधार की व्याख्या नहीं की गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि विभेद का आधार वैसा ही है, जैसा कि द्विजों तथा शूद्रों के बीच का है। शूद्रों की भांति अवर्ण जातियां भी द्विज वर्ग में नहीं आतीं। वे द्विज नहीं होते और उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का कोई अधिकार नहीं है। इससे भी दो तथ्य उभर कर सामने आते हैं, जिनकी प्रायः अनेदेखी कर दी जाती है। पहला तथ्य यह है कि सवर्ण शाखा की शूद्र जातियों तथा अवर्ण शाखा की आदिम तथा जरायम-पेशा जातियों के बीच अंतर बहुत मामूली-सा है। दोनों ही अस्पृश्य हैं और दोनों ही द्विज-वर्ग में नहीं आतीं। यह अंतर सांस्कृतिक विकास का है। हालांकि रूढि़वादी की दृष्टि से इन दो के बीच अधिक सांस्कृतिक अंतर है, जैसा कि सुसंस्कृत तथा ठेठ बर्बर के बीच होता है, लेकिन अंतर मात्रा-भेद का है। इस सांस्कृतिक अंतर को स्पष्ट करने के लिए हिंदुओं ने एक नई शब्दावली गढ़ी है। वह शूद्रों के दो वर्ण मानती हैंः (1) सत्शूद्र अथवा सुसंस्कृत शूद्र, और (2) शूद्र। उसने शूद्रों के प्राचीन वर्ग को सत्शूद्र अथवा सुसंस्कृत शूद्र कहा और आदिम जाति सहित उन लोगों के लिए शूद्र शब्द प्रयोग किया, जो हिंदू सभ्यता की परिधि मे आ गए थे। नई शब्दावली का आशय यह नहीं है कि शूद्रों के अधिकारों तथा कर्तव्यों में कोई अंतर है। विभेद केवल इतना है कि कुछ शूद्र द्विजों के साथ सहजीवन के लिए उपयुक्त हैं और कुछ कम उपयुक्त हैं।
अवर्ण जातियों का आपस में क्या संबंध है? क्या वे केवल जातियों के समूह हैं या उनके बीच कोई वर्ग-विभेद है? निश्चय ही वे केवल जातियों के समूह हैं। निश्चय ही अवर्ण जातियों के इस समूह में वर्ग-विभेद हैं। पर इस बारे में कुछ संशय हो सकता है कि आदिम जातियों तथा जरायम-पेशा जातियों के बीच कोई वर्ग-विभेद है या नहीं। संभवतः यह अंतर अत्यंत क्षीण है। लेकिन इनमें कोई संदेह नहीं कि आदिम जातियों व जरायम-पेशा जातियों और अस्पृश्यों के बीच स्पष्ट और व्यापक वर्ग-विभेद है। प्रथम दो के मन में यह अति स्पष्ट धारणा है कि अवर्ण जातियों के इस समूह में उच्च जातियां हैं और अस्पृश्य निम्न स्तर की जातियां हैं।
अब तक की चर्चा से पता चलता है कि हिंदू समाज-संगठन की तीन विशिष्टताएं हैंः (1) जाति, (2) जातियों का क्रम, और (3) जाति-व्यवस्था को भेदती हुई वर्ग-व्यवस्था। इसमें संदेह नहीं कि यह ढांचा बड़ा ही जटिल है और जो इसके ताने-बाने का अंग न हो, उसके लिए अपने मन में इस बारे में सही तस्वीर बना लेना शायद कठिन हो। संभव है कि इसे एक डायग्राम की सहायता से समझा जा सके। मैं नीचे एक ऐसा ही डायाग्राम दे रहा हूं, जो मेरे विचार में हिंदुओं के इस सामाजिक ढांचे की कुछ झलक दे सकता है।