वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया
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में रख दिया जाता है। घेरे में यह रेखा जाति को वर्ग में विभाजित करती है और उसे दूसरे वर्ग से अलग करती है। जाति का वर्ग, जाति जितना संगठित नहीं होता। लेकिन वहां वर्ग की भावना होती है। तीसरी बात ध्यान देने योग्य यह है कि किस आधार पर यह घेरा बना। ये अनेक हैं। कुछ स्थाई हैं और कुछ अस्थाई। द्विज जातियों और शूद्र जातियों के बीच कोई विभाजन है ही नहीं। वह तो केवल पर्दा-भर है। यह विभाजन है ही नहीं। इसका उद्देश्य उन्हें अकेले रखना है। उसका उद्देश्य विभाजन नहीं है। शूद्र जातियों तथा प्रथम दो अवर्ण जातियों के बीच विभेद एक नियमित विभाजनं है। लेकिन वह क्षीण भी है और थोड़ा भी। उसे लांघा जा सकता है। यह विभाजन दोनों को अलग करता है, पर पूर्ण पृथक नहीं करता। लेकिन इन तीन वर्गों और अस्पृश्यों के बीच विभाजन, वास्तविक विभाजन है और उसे हटाया नहीं जा सकता। वह कंटीले तार की बाढ़ जैसा है और उसका उद्देश्य होता है, स्पष्ट अलगाव करना। इसी बात को एक भिन्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है कि प्रथम तीन घेरे इस प्रकार रखे गए हैं कि वे एक-दूसरे के भीतर हैं। द्विजों तथा शूद्र जातियों के बीच पहले विभाजन को हटाया जा सकता है और वे दोनों अलग-अलग घेरों के बजाए एक घेरे में रखे जा सकते हैं। इसी प्रकार दूसरे विभाजन को हटाया जा सकता है और उस दशा में द्विज, शूद्र, आदिम तथा जरायम-पेशा जातियां यदि एक इकाई नहीं, तो एक समूह बना सकते हैं और एक ही घेरे में रह सकते हैं। लेकिन तीसरे विभाजन को कभी भी हटाया नहीं जा सकता, क्योंकि जातियों के ये तीनों वर्ग एक मुद्दे के बारे में एकमत हैं कि वे कभी भी अस्पृश्यों के साथ लोगों की एक इकाई के रूप में एक नहीं होंगे (अंग्रेजी की मूल पांडुलिपि की टंकित प्रति में यह स्थान खाली छोड़ दिया गया है। ‘एक’ शब्द अंग्रेजी खंड में उनके सं. मंडल द्वारा जोड़ा गया है - संपादक) यह एक जघन्य बाधा है, जो अस्पृश्यों को ‘शेष’ से अलग करती है और उन्हें अलग-थलग होने के लिए विवश करती है।
इस डायाग्राम में जातियों के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे से ऊंचे दिखाया गया है। यह ऊंच-नीच के क्रम को स्पष्ट करने के लिए किया गया है, जो जाति-व्यवस्था का एक प्रमुख लक्षण है। मैंने सवर्ण जातियों के दो वर्गों को उच्च वर्ग की जातियां और निम्न वर्ग की जातियां और निम्नतम वर्ग की जातियां नहीं बताया है। एक दृष्टि से यह ठीक ही होता। सामान्य सामाजिक क्रम में निस्संदेह वे निम्नतर और निम्नतम है। लेकिन एक अन्य दृष्टि से यह उचित नहीं होता। उच्च, निम्न, निम्नतर और निम्नतम की शब्दावली से यह ध्वनित होता है कि वे एक पूरी इकाई के अंग हैं। लेकिन क्या अवर्ण जातियां और सवर्ण जातियां एक पूरी इकाई की अंग है। वे नहीं हैं। अब वर्तमान जाति-व्यवस्था की जननी वर्ण-व्यवस्था की योजना तैयार की गई तो आदिम और जरायम-पेशा जातियों विचाराधीन नहीं थीं।