2. वह समाज जिसे हिंदुओं ने बनाया - Page 69

54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अतः वर्ण-व्यवस्था के नियमों में उनके दर्जे और स्थान के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया। लेकिन अस्पृश्यों के बारे में स्थिति ऐसी नहीं है। वे वर्ण-व्यवस्था के समय विचाराधीन थे। अस्पृश्यों के बारे में वर्ण-व्यवस्था के नियम अत्यंत स्पष्ट और अत्यंत सटीक हैं। हिंदू विधान के निर्माता मनु ने अपने नियम में कहा है कि वर्ण केवल चार हैं और पांचवां वर्ण नहीं होगा। जो सुधारक श्री गांधी के अस्पृश्यता निवारण आंदोलन में उनके समर्थक हैं, वे मनु की व्यवस्था को एक नया अर्थ देने का प्रयास कर रहे हैं। वे कहते हैं कि मनु को गलत समझा गया है। मनु के अनुसार कोई पांचवां वर्ण नहीं है और इस लिए उनका मंतव्य अस्पृश्यों अर्थात् शूद्रों को चौथे वर्ण में शामिल कर लेना था। लेकिन यह तो स्पष्टतः उल्टी व्याख्या है। मनु का जो आशय था, वह यह था कि मूलतः चार वर्ण हैं, और वे चार ही रहने चाहिएं। वह अस्पृश्यों को उस भवन में प्रवेश दिलाने को तैयार नहीं थे, जिसे प्राचीन हिंदुओं ने वर्ण-व्यवस्था में विस्तार कर उसे पांच वर्णों के लिए बनाया था। जब उन्होंने यह कहा था कि पांचवां वर्ण नहीं होगा, तब उनका यही आशय था। अस्पृश्यों को उन्होंने जो नाम दिया है, उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वह यही चाहते थे कि अस्पृश्य हिंदू समाज-व्यवस्था से बाहर ही रहें। उन्हें वर्ण बाह्य (वर्ण-व्यवस्था से बाहर के लोग) कहा गया है। आदिम व जरायम-पेशा जातियों और अस्पृश्यों के बीच यही विभेद है। आदिम व जरायम-पेशा जातियों के विरुद्ध हिंदू समाज में प्रवेश के लिए कोई निश्चित वर्जना नहीं है। वे कालांतर में उसके सदस्य बन सकते हैं। फिलहाल वे हिंदू समाज से जुड़े हैं और उसके बाद में उसमें घुलमिल सकते हैं तथा उसका अंग बन सकते हैं। लेकिन अस्पृश्यों की स्थिति अलग है। हिंदू समाज में उनके विरुद्ध निश्चित वर्जना है। उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्हें अलग-थलग ही रखना होगा और वे हिंदू समाज का अंग नहीं बन सकते। अस्पृश्य हिंदू समाज के अंग नहीं हैं, और यदि वे कुछ हैं, तो वे उसके अंग मात्र हैं, अंग नहीं। हिंदुओं और अस्पृश्यों के बीच क्या संबंध हैं, इसकी सटीक व्याख्या बंबई के एक सम्मेलन में सनातनी हिंदुओं के नेता ऐनापुरे शास्त्री ने की है। उन्होंने कहा कि हिंदुओं के साथ अस्पृश्यों का संबंध तो वैसा ही है, जैसा किसी मनुष्य का उसके जूतों के साथ होता है। आदमी जूते पहनता है। इस दृष्टि से वह मनुष्य के साथ हैं, और कहा जा सकता है कि वह मनुष्य के हैं। लेकिन वह शरीर का अंग नहीं हैं, क्योंकि जिन दो चीजों को किसी इकाई से अलग किया जा सकता है, उन्हें उस इकाई का अंग नहीं कहा जा सकता। जो कुछ भी हो, यह उपमा है बड़ी सटीक।