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हिंदू समाज की आधार-शिला
हिंदू समाज जातियों का घरौंदा है। हिंदुओं की कोई एक जाति नहीं है। ये जातियां विभिन्न वर्गों में गठित जन-समुदाय है। यही उसकी विशेषता है। यह धारणा उन विदेशियों की है, जो इतिहास के विभिन्न कालों में भारत आते रहे हैं। तथापि ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि यह जाति का कोई असामान्य गुण नहीं है। उदाहरणार्थ प्रो. बेन्स का मत हैः
इस व्यवस्था में ऐसा कोई विलक्षण गुण नहीं है, जो अन्य देशों में, यहां तक
कि पश्चिम के देशों में भी कभी-न-कभी न रहा हो या न मिल सकता हो, भले
ही वह वहां अन्य प्रभावों के कारण काफी अर्से पहले ही समाप्त हो चुका है।
कुछ समुदायों का धीरे-धीरे संप्रदाय अथवा वर्गों के रूप में बदल जाना सामान्य
अथवा सार्वभौमिक प्रवृत्ति है और उनमें कुछ का आनुवांशिक या सबसे पृथक या
परिस्थितिवश उच्च हो जाना कोई अस्वाभाविक बात नहीं कही जानी चाहिए।
अगर हम आदिम जातियों के सामाजिक संगठन के संदर्भ में विचार करें, तो इस तर्क की पुष्टि हो जाती है। आदिम समाज में मनुष्य कभी भी अकेला नहीं रहा।
अतः मनुष्यों की सर्वाधिक सामान्य और सर्वाधिक सहज प्रवृत्ति यह है कि वे वर्गों में रहते हैं। ऐतिहासिक कालक्रम में इन सामाजिक वर्गों के अनेक रूप बनते गए। परिवार एक ऐसा ही सामजिक वर्ग है। वह सर्वत्र पाया जाता है और अब भी है। परिवार के तुरंत बाद उससे बड़ा वर्ग है, कुल। कम-से-कम शब्दों में कहा जाए तो यह कुल (वंश या गोत्र भी) ऐसे व्यक्तियों का वर्ग समझा जाता है, जो एक-दूसरे से अपनी-अपनी मां या अपने-अपने पिता के जरिए संबंध की ओर से एक-दूसरे से संबंधित हों। दूर के रिश्ते के लोगों को भी भाई-बहन, आदि समझा जाता है और उन्हें उस कुल का सदस्य माना जाता है। हो सकता है कि यह संबंध बिल्कुल बनावटी हो, पर सामाजिक दृष्टि से यह उतना ही यथार्थ संबंध होता है जितना कि