3. हिंदू समाज की आधार-शिला - Page 71

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वह संबंध, जो समान रक्त पर आधारित होता है। वे कुल आपस में मिलकर समाज बन जाते हैं। जब कुलों को दो वर्गों में संगठित किया जाता है तो प्रत्येक वर्ग मोइती कहलाता है। जब कुलों को दो से अधिक वर्गों में संगठित किया जाता है, तो हरेक को फ्रात्री कहते हैं। यह विभाजन विश्व में हर जगह देखने में नहीं आया। मोइती या फ्रात्री के कार्यकलापों के बारे में सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि हर मोइती और फ्रात्री एक सामाजिक वर्ग था और इस प्रकार जो वर्ग बने, उनमें आपस में भाईचारे की भावना होती थी। उसके बाद आते हैं, जनजातीय वर्ग। जनजातियों के स्वभाव, चरित्र और गठन में भारी अंतर होता था। हो सकता है कि जनजातीय ग्राम समुदायों से बनी हों और वे मोइती या कुल के रूप में न बंटी हों। हो सकता है कि उनमें कुल होते हों और मोइती न होते हों, अथवा मोइती हों, कुल न हों, अथवा कुल भी हों और मोइती भी हों। जनजातीय चेतना कभी प्रबल होती थी और कभी निर्बल। भले ही वर्गों के रूप में जनजातियों का गठन किसी निश्चित नियम के आधार पर न हुआ हो, अथवा इनका विकास किसी विशिष्ट दृष्टिकोण के आधार पर नहीं हुआ हो, पर उनमें कुछ समानता होती थी, जैसे एक-सी बोली, एक से रीति-रिवाज, कमोबेश निश्चित भू-क्षेत्र और कोई ऐसी शासन-प्रणाली, जिसके अधीन समूची जनजाति रहती थी। जनजाति के वर्ग से बड़ा जनजातियों का संघ या महासंघ होता था। लेकिन यह विरले थे। किसी खतरे का सामना करने के लिए जनजातियां परस्पर अनौपचारिक गठजोड़ से कोई एक संघ बना लेती होंगी। आदिम जातियों में परस्पर एक होने के दृष्टांत प्रायः नहीं मिलते। प्रसिद्ध इरोक्वोई (उत्तरी अमरीका की इंडियन जनजातियां) महासंघ ऐसी ही एक अपवाद है।

जो भी सामाजिक वर्ग बने, उनका आधार सगोत्रीयता या स्थानीयता रही। आदिम जातियों में विभिन्न वर्गों के निर्माण का आधार कुछ और है। यह लिंग, आयु या कोई अन्य आधार होता था। इस प्रकार जो सामाजिक वर्ग बने, उनको यदि हम ध्यान में रखें तो यह देखेंगे कि जाति नाम के इस सामाजिक वर्ग की उत्पत्ति में कोई नई या विलक्षण बात नहीं है। जाति एक प्रकार का कुल या कुनबा है और कुल या कुनबे की तरह यह भी यह प्रकार का सामाजिक वर्ग है।

यह स्वीकार किया गया है कि जाति और कुल में अनुरूपता है, दोनों एक ही तरह के वर्ग हैं, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि जहां तक अर्थ और प्रयोजन का संबंध है, जाति और कुल परस्पर विरोधी हैं। कोई ऐसी कुल-व्यवस्था नहीं है, जिसकी जाति-व्यवस्था के साथ तुलना की जा सके। चूंकि कुल-व्यवस्था जैसी कोई जाति-व्यवस्था नहीं है, इसलिए कुलों में से कोई श्रेणी नहीं होती। वास्तव में आदिम