हिंदू समाज की आधार-शिला
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जातियों का कुल-संगठन हिंदुओं की वर्ण-व्यवस्था से सर्वथा विपरीत है। में अनुरूपता की बात को केवल अपनी बात कहने के लिए स्वीकार करता हूं। मेरे विचार में यह सवाल कि जाति-व्यवस्था स्वाभाविक है या अस्वाभाविक, असाधारण है या साधारण, एक बड़ा ही रोचक विषय है, इससे अनेक बातों की जानकारी होती है। लेकिन यह सवाल उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह सवाल, जिसे मैं उठाना चाहता हूं। यह सवाल है कि क्या कारण है कि जाति-व्यवस्था अब भी जिंदा है, ज्यों-की-त्यों बनी हुई है, जब कि अन्य देशों में विद्यमान ऐसे ही सामाजिक वर्ग सभ्यता के विकास के साथ-साथ लुप्त हो गए हैं।
रोमनों का हिंदुओं जैसा ही सामाजिक संगठन था। जब ऐसी सभी संस्थाएं नहीं रहीं, तो केवल जाति-व्यवस्था ही क्यों बच गई है? लोग इसके नियमों को क्यों मानते हैं? जाति के लिए मान्यता क्या है।
सर्वत्र समाज के नियमों के पालन के लिए चार प्रकार का दंड-विधान होता है। वह इस प्रकार हैंः (1) प्राकृतिक, (2) लोकापवाद, (3) कानूनी, और (4) धार्मिक। इनमें से कौन-सा दंड-विधान जाति-व्यवस्था की पुष्टि करता है? इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह बताना उचित होगा कि यह दंड-विधान किसी प्रकार व्यवहृत होता है।
प्राकृतिक दंड-विधान स्वभाव के द्वारा व्यवहृत होता है। जब कोई व्यक्ति किसी निश्चित तरीके से काम करने का आदी हो जाती है तो उस प्रकार कार्य करने के लिए उस पर कोई जोर नहीं डालना पड़ता। वह उसे स्वयं करने लगता है और रोजमर्रा के रूप में नियम से कार्य करना निश्चित हो जाता है।
लोकापवाद दंड-विधान लोकमत के माध्यम से व्यवहृत होता है। वह कतिपय तौर-तरीकों के बारे में समाज में प्रचलित स्वीकृति और अस्वीकृति की भावना है। कतिपय तौर-तरीका बन जाता है और सुस्थापित आम तरीके के अनुरूप किए गए कार्य स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं और उसके विरुद्ध किया गया कोई कार्य अस्वीकार कर दिया जाता है।
प्राकृतिक दंड-विधान और लोकापवाद, इन दोनों में कोई विशेषता नहीं होती। वे सर्वत्र और हर सामाजिक कहे जाने वाले कार्य की पृष्ठभूमि में रहते हैं। उनके प्रभाव के विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है, लेकिन जहां कहीं भी ये प्रभावपूर्ण होते हैं, वहां वे एक-दूसरे से पुष्ट होकर भी प्रभावपूर्ण होते हैं। केवल काननी और धार्मिक दंड-विधान ही ऐसे दंड-विधान हैं, जो किसी संस्था को जीवित रख सकते हैं।