58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इसमें कोई संदेह नहीं की वर्ण-व्यवस्था को हिंदू कानून की मान्यता प्राप्त है। हिंदू कानून का हर ग्रंथ जाति को कानूनी संस्था स्वीकार करता है, जिसका उल्लंघन करना अपराध है और जिसके दंड का विधान है। मनु के कानून का ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ अथवा मानव धर्म-शास्त्र कहते हैं, हिंदुओं के कानून का सबसे पुराना और सबसे प्रामाणिक ग्रंथ है। उसके उद्धरणों से यह भली-भांति स्पष्ट हो जाएगा कि जाति पर कानूनी मान्यता की मोहर लगी हुई है।
हिंदू कानून का निर्माता मुन चार वर्णों की व्यवस्था को कानूनी मान्यता प्रदान करता है कि मनु की संहिता का प्रमुख उद्देश्य चार वर्णों के कानून की व्यवस्था करना था। संहिता के प्रारंभिक श्लोकों से ही यह बात स्पष्ट है। उसमें कहा गया हैः
1.1 एक समय बहुत से महर्षि मनु के पास आए जो एकाग्रचित्त
बैठे थे और और उनकी विधिपूर्वक अर्चना करके उनसे यह
वचन बोलेः
1.2 हे भगवान, आप हमें अनुक्रम के अनुसार सभी वर्णों (प्रमुख
चार) और उनके बीच के वर्णों में से प्रत्येक के धर्म, सटीक
रूप से बताएं।
इस प्रकार वह वर्ण-व्यवस्था को अपनी ओर से न केवल कानूनी मान्यता देता है, अपितु राजा के लिए अनिवार्य व्यवस्था भी देता है कि वह इस संस्था की रक्षा करेः
7.35 राजा की सृष्टि वर्णों (जातियों) और आश्रमों की रक्षा के लिए की गई है
जो अपने पद के अनुसार अपने नाना कर्तव्यों को पूरा करते हैं।
7.24 दंड के विभ्रम-अभाव या अनुचित प्रयोग से सब वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय
आदि) दूषित (पत्नी-संभोग से वर्णसंकर) हो जाएंगे, सब मर्यादा
(चतर्वर्ग-फल प्राप्ति का कारणभूत नियम) छिन्न-भिन्न हो जाएंगे और
सब लोगों में (एक-दूसरे के प्रति) क्षोप उत्पन्न हो जाएगा।
जाति के उल्लंघन को मनु पाप कहता है और जो जाति से च्युत होकर पतित हो जाता है, उसके लिए वह भिन्न-भिन्न तीन प्रकार के दंडों की व्यवस्था करता है। पहला दंड मृत्यु के बाद का दंड है। मनु कहता हैः
12.59 जो पतितों के साथ संबंध रखता है, जो अन्य पुरुषों की स्त्रियों के साथ
संभोग करता है, जो ब्राह्मण की संपत्ति का अपहरण करता है, वह
ब्रह्मराक्षस हो जाता है।