हिंदू समाज की आधार-शिला
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इस जीवन में पतित के लिए दंड का विधान दोहरा था। एक तो बहिष्कार था। मनु ने बहिष्कार का जो रूप-स्वरूप निश्चित किया है, वह इस प्रकार हैः 11.180. जो पतित के साथ संबंध रखता है, उसके साथ सवारी करता है,
एक ही आसन पर बैठता है, भोजन करता है, वह एक वर्ष में,
और जो पतित के साथ यज्ञ करता है, उसे विद्याध्ययन कराता है
या जो पतित के साथ विवाह संबंध रखता है, वह तत्काल पतित
हो जाता है।
11.181. जो इन पतितों में से किसी भी पतित के साथ संबंध रखता है,
उसे (ऐसे) संबंध जन्य पाप के शमन के लिए वही प्रायश्चित
करना चाहिए, जो इस प्रकार के पतितों के लिए निर्धारित है। 11.182. पतित (व्यक्ति के) सपिंडों और समानोदकों को चाहिए कि वे
किसी अशुभ दिन गांव से बाहर सायंकाल के समय बांधवों,
पुरोहितों और गुरुओं की उपस्थिति में उसे (जैसे वह मर गया
है) जलदान करें।
11.183. कोई नौकरानी पानी से भरे घड़े को, जैसे वह मृत व्यक्ति के
लिए हो, अपनी लात से ठोकर मारकार लुढ़का दे और पतित
व्यक्ति के सपिंड जन व समानोदक जन एक दिन और एक रात
का अशौच मानें।
11.184. इसके बाद उसके महापालकों के जाति वाले उसके साथ बात न
करें, न एक आसन पर साथ बैठें, न दायभाग दें और न कोई
लौकिक व्यवहार ही, जैसा कि प्रायः होता है, उसके साथ रखें। दूसरा था दायभाग से वंचित करना।
9.201. नपुंसक, पतित, जन्मान्ध, जन्मवधिर पागल, मूर्ख और गूंगा तथा
किसी भी (कर्म या स्पर्श) इंद्रिय से शून्य व्यक्ति दाय के भागी
नहीं होते।
11.185. और (यदि वह ज्येष्ठ हो) तो उसका ज्येष्ठता का अधिकार और
उसे प्राप्य अतिरिक्त अंश नहीं दिया जाएगा और उसके स्थान पर
कोई छोटा भाई जो गुणवान हो, अपने ज्येष्ठ भाई के अंश को
प्राप्त करेगा।
बहिष्कार और दायभाग से वंचित होने के दोनों दंडों से मुक्ति का एक ही उपाय