3. हिंदू समाज की आधार-शिला - Page 75

60 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

था कि वह विहित रीति से प्रायश्चित कर ले। प्रायश्चित ही एकमात्र उपाय था। मनु कहता हैः

11.187. और यदि वह प्रायश्चित कर ले तो उसके सजातीय उसके साथ

पवित्र जलाशय में स्नान करेंगे और वहां एक नया घड़ा रखेंगे,

जो जल से भरा होगा।

11.188. और वह उस घड़े को जल से छोड़ देगा। वह घर लौटेगा और

पहले की तरह अपने संबंधियों के प्रति अपने सभी कर्तव्य करने

लगेगा।

पतित पुरुष और पतित स्त्री में एक भेद था। किसी को छूट नहीं थी। नियम दोनों पर लागू होता है। मनु कहता हैः

11.189. जहां तक पतित स्त्रियों का संबंध है, वे भी उसी नियम का

पालन करें, परंतु उन्हें भोजन, वस्त्र, पानी दिया जाए और वे अपने

(परिवार के घर) के निकट निवास करें।

कानूनी मान्यता सशक्त मान्यता थी। जाति के उल्लंघन के लिए कानून में दोहरे दंड की व्यवस्था थी। उसमें बहिष्कार भी था और साथ ही दायभाग के अधिकार से वंचित किए जाने का भी विधान था। ये दंड कितने कड़े थे, उसका सम्यक वर्णन सर टामस स्ट्रेंज ने हिंदू कानून संबंधी अपने निबंध में किया है। वह इस विषय में लिखते हैंः

अब एक मामले पर विचार करना बाकी है। यह व्यक्तिगत है कि वह

त्रुटि से संबंधित है, जो पर्याप्त चर्चा का विषय रही है। इस कारण व्यक्ति

निष्काषित कर दिया जाता था, उस मर्यादा दी जानी बंद कर दी जाती थी,

उसे जातिच्युत कर दिया जाता था। इसका प्रभाव यह होता है कि व्यक्ति

समाज में संपर्क रखने से वंचित कर दिया जाता था, वह किसी भी समारोह

में भाग नहीं ले सकता था, वह किसी भी कार्य के योग्य नहीं रह जाता

था। उससे जीवन की सारी सुविधाएं छीन ली जाती थीं। उसके साथ सभी

प्रकार के सामाजिक संबंध तोड़ दिए जाते थे। ज्यों ही किसी व्यक्ति को

दंड दे दिया जाता था, उसी क्षण से ही उससे न तो कोई बात करेगा, न

उसके पास बैठेगा, वह दाय में किसी भी अंश का या किसी प्रकार की

संपत्ति का अधिकारी नहीं रह जाता, उसे किसी भी समारोह के लिए, जो

चाहे साधारण हो या विशेष, जैसे नव वर्ष पर आयोजित उत्सव, कोई न्योता