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हिंदू समाज की आधार-शिला

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अतः ऐसा लगता है कि जाति से बहिष्कृत व्यक्ति के मामले को छोड़कर दायभाग की अयोग्यता केवल वैयक्तिक है। कहा जा सकता है कि हर बहिष्कृत व्यक्ति को अधिकार है कि उसका पालन-पोषण किया जाए और वह कभी भी अपने पहले के अधिकारी को फिर से प्राप्त कर सकता है। इन प्रावधानों के पीछे जो भी सूझबूझ हो, यह नहीं कहा जा सकता कि ये सर्वत्र न्याय-रहित हैं या पूर्णतः मानवीयता-रहित हैं। हमें इस देश के कानून की तुलना अपने देश के कानून से करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि हमने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है कि वसीयत के द्वारा बच्चों को दायभाग से पूर्णतः वंचित न किया जा सके।

अगले अध्याय में यह बताया गया है कि इन दोनों धर्मों में किसी में भी दीक्षा प्राप्त व्यक्ति (जैसे हमारे यहां प्रत्येक धार्मिक क्रांति से पूर्व दीक्षा प्राप्त व्यक्ति) सामाजिक दृष्टि से मृत समझ लिया जाता है और उसकी संतान उसके जीवन-काल में ही उत्तराधिकार ग्रहण कर लेती है, मानो उसकी स्वाभाविक मृत्यु हो गई हो, और जिस प्रकार वह व्यक्ति स्वयं सांसारिक कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है, वह दायभाग के अयोग्य घोषित कर दिया जाता है, वैसे ही वह व्यक्ति भी जो शुरू में भक्त होने का दंभ भरता है और बाद में भक्त बन भी जाता है। पहली श्रेणी में वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो दिखावा करते हैं, बहुरूपिए होते हैं और जो पवित्र चिर्िंं व प्रतीकों को धारण करते हैं, कृष्छ साधना करते हैं, लेकिन उनकी दृष्टि स्वार्थपूर्ण होती है।

बहिष्कार का शेष कारण है अनुचित विवाह, अर्थात् वह विवाह, जिसमें पति और पत्नी एक ही वंश के हों। ऐसा विवाह बेमेल होता है। अतः उसके फलस्वरूप जो संतान होगी, वह दायभाग प्राप्त नहीं कर सकती, जो शूद्रों में होता है। और वही परिणाम उस विवाह का होता है, जहां विवाह वर्ग क्रम के अनुसार नहीं हुआ हो।

अब देखना यह है कि ऐसी स्थिति में क्या उसका उत्तराधिकारी यदि उस पर कोई रोक न हो, दायभाग प्राप्त कर सकता है? क्या जाति को धर्म की धार्मिक मान्यता प्राप्त है? वेद जाति को मान्यता देते हैं।

‘ट्टगवेद’ जाति को मान्यता देता है और निम्नलिखित छंदों में उसकी व्याख्या मिलती हैः

  1. इस पुरुष को एक सहस्त्र शीर्ष हैं, एक सहस्त्र नेत्र हैं, एक सहस्त्र चरण

हैं। यह पृथ्वी को चारों ओर से आवृत्त किए हुए हैं, यह पृथ्वी से दस