64 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अंगुल ऊपर है।
- यह पुरुष स्वयं समस्त (ब्राह्मंड) है, जो वर्तमान में तथ्य जो भी भविष्य
में होगा। यह पुरुष अमरत्व का स्वामी है, जो अन्न से समृद्ध होता है।
- ऐसी उसकी विराटता है, पुरुष इससे श्रेष्ठ जो कुछ अस्तित्व में है वह
इसका चतुर्थांश है, उसका तीन-चौथाई यह अमर्त्य आकश है।
- पुरुष का तीन-चौथाई भाग ऊपर स्थित है। इसका चौथाई भाग इस पुरुष
से पुनः उत्पन्न हुआ। उसके बाद यह सभी में विकीर्ण हो गया, उनमें
जो भोजन करते हैं और उनमें जो भी भोजन नहीं करते।
- उससे विराट और विराट से पुरुष पैदा हुआ। जब वह उत्पन्न हो गया
तब पृथ्वी से परे, उसके आगे और उसके पीछे विस्तृत हो गया।
- जब देवताओं ने नव पुरुष की बलि देकर यज्ञ किया तब वसंत घृत था,
ग्रीष्म समिधा थी और शरद (उसके साथ) नैवेध बनी।
- उन्होंने इस बलि, अर्थात् पुरुष को जो आरंभ में जन्मा था, यज्ञ की
समिधा में भस्म कर दिया। देवताओं, साध्यों और ट्टषियों ने उससे यज्ञ
किया।
- उस विराट यज्ञ के साथ दही और घृत प्राप्त हुआ। उससे वायु में उड़ने
वाले पक्षी तथा जंगली एवं पालतू पशु बने।
उस विराट यज्ञ से ट्टचाएं, साम, छंद और यजुः उत्पन्न हुए।
उससे घोड़े और दोनों ओर दांत वाले सभी सभी पशु पैदा हुए। उसी से
गाएं उत्पन्न हुईं और उसी से बकरियां तथा भेड़ें पैदा हुईं।
- जब (देवों ने) पुरुष कों विभक्त किया तो उन्होंने उसे कितने भागों में
बांटा? उसका मुख क्या था? उसकी भुजाएं क्या थीं? किन (दो) को
उसकी जंघाएं और पैर कहा गया?
- ब्राह्मण उसका मुख था_ राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएं थीं, जिन प्राणियों
को वैश्य कहा जाता है, वे उसकी जंघाएं थीं और उसके चरण से शूद्र
उत्पन्न हुए।
- उसकी आत्मा (मानस) से चंद्रमा, उसकी आंख से सूर्य, उसके मुख से
इंद्र और अग्नि उसके श्वास से वायु पैदा हुए।