हिंदू समाज की आधार-शिला
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- उसकी नाभि से अंतरिक्ष, उसके सिर से लोक, पैरों से भूमि, उसके कानों
से चारों दिशाएं पैदा हुईं _ इस तरह (देवों ने) लोकों की रचना की।
- जब देवताओं ने यज्ञ करते हुए पुरुष को बलि के रूप मे बांधा तब
(अग्नि के चारों ओर) उसके लिए सात समिधाएं रखी गईं और उसमें
इक्कीस समिधाओं का ईंधन तैयार किया गया।
- देवताओं ने बलि देकर यज्ञ किया। उन महान शक्तियों ने स्वर्ग को प्राप्त
किया जहां पूर्ववर्ती साध्य, देवता हैं।
ब्राह्मण-ग्रंथ भी जाति को मान्यता प्रदान करते हैं। ‘शतपथ ब्राह्मण’ में जाति का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैः
- ब्रह्म (यहां टीकाकार के अनुसार अग्नि और ब्राह्मण के प्रतिनिधि के रूप
में विद्यमान) पहले यह (ब्रह्मांड) था, केवल एक। एक अकेला होने
के कारण, उसका विस्तार नहीं हुआ। उसने अपने ओज से एक अद्भुत
रूप ‘क्षात्र’ उत्पन्न किया, अर्थात् देवों मे से जो शक्तियां (क्षत्राणी) हैं,
यथा इंद्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु, ईशान। अतः ‘क्षात्र’ से
बढ़कर कोई नहीं है। इसीलिए राजसूय यज्ञ में ब्राह्मण क्षत्रिय से नीचे
आसन ग्रहण करता है, वह ‘क्षात्र’ (राज शक्ति) को गौरव प्रदान करता
है। यह ‘ब्रहम’ ही क्षात्र का उद्गम है। अतः यद्यपि राजा प्रधानता प्राप्त
कर लेता है, पर अंततः ब्राह्मण के आश्रित रहता है, जो उसका मूल है।
जो उसे (ब्राह्मण को) नष्ट करता है, वह अपने ही मूल को नष्ट करता
है। जो अपने से श्रेष्ठ को आहत करता है, उसकी स्थिति अति दयनीय
हो जाती है।
- उसका विकास नहीं हआ। उसने ‘विश’, अर्थात् वेदों के उस वर्ग को
पैदा किया, जो वीर सैनिकों के रूप में जाने जाते हैं, जैसे वसु, रुद्र,
आदित्य, विचदेव, मरुत आदि गण।
- उसका विकास नहीं हुआ। उसने शूद्र जाति, पूषण को पैदा किया। यह
पृथ्वी है, क्योंकि वह चराचर का पोषण करती है।
- उसका विकास नहीं हुआ। उसने अपने ओज से एक अद्भुत रूप न्याय
(धर्म) को पैदा किया। यह शासकों का शासक (क्षात्रों का क्षात्र),
अर्थात् न्याय है। अतः न्याय से बढ़कर कुछ नहीं है। अतः निर्बल सबल
पर विजय के लिए न्याय, अर्थात् राजा के द्वारा सहारा लेता है। यह न्याय
ही सत्य है। अतः जो व्यक्ति सत्य कहता है, उसके बारे में कहा जाता