66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि वह ‘न्याय’ कहता है, अर्थात् जो न्याय कहता है, वह सत्य कहता
है क्योंकि इसके ये दोनों ही पक्ष हैं।
- यह है ब्रह्म, क्षात्र, विश और शूद्र। अग्नि के द्वारा वह देवताओं में ब्रह्मा
बना, मनुष्यों में ब्राह्मण, (दिव्य) क्षत्रियों के द्वारा क्षत्रिय (मानव),
(दिव्य) वैश्य के द्वारा वैश्य (मानव), (दिव्य) शूद्र के द्वारा शूद्र (मानव)
बना। इसी कारण वे देवों के बीच अग्नि में और मानवों के बीच और
ब्राह्मणों में आश्रय खोजते हैं।
तैत्तरीय ब्राह्मण (1) 2, 6, 7 - दैव्यो वे वर्णों ब्राह्मण असूर्यौ शूद्रः। ‘ब्राह्मणों
की उत्पत्ति देवों से और शूद्रों की असुरों से हुई है।’
यह मानना पड़ेगा कि जाति की गाड़ी को आगे चलाते रहने वाले दो शक्तिशाली इंजन थे - कानून और धर्म, निस्संदेह इन दोनों में से धार्मिक मान्यता प्रमुख मान्यता थी और जाति को केवल धार्मिक मान्यता के बल पर जीवित रखा गया। यह दो कारणों से और भी स्पष्ट हो जाता है। यह मानना पड़ेगा कि कानूनी मान्यता का सहारा तो कभी-कभी ही लिया गया। इसका अर्थ है कि जाति को अन्य साधनों से जिंदा रखा गया। दूसरे, कानूनी मान्यता का उपयोग केवल 1850 तक किया गया। उस वर्ष ब्रिटिश सरकार ने जाति अयोग्यता निवारण अधिनियम (कास्ट डिसएबिलिटीज रिमूवल एक्ट) बनाकर इस पर वे कानूनी मान्यता उठा ली, या यूं कहें कि समाप्त ही कर दी गई थी। हालांकि कानूनी मान्यता वापस ले ली गई, पर जाति को बराबर मान्यता मिलती रही। उसमें कोई कमी नहीं आई। यदि जाति को कानूनी मान्यता के अलावा धार्मिक मान्यता न प्राप्त होती, जो उससे भी अधिक शक्तिशाली थी, तो जाति का बना रहना संभव नहीं था।
यह निर्विवाद है कि धार्मिक मान्यता से अधिक शक्तिशाली कोई और मान्यता नहीं हो सकती, जिसे कोई संस्था या आस्था अपने अस्तित्व को बनाए रखने और उसे पुष्ट करने के लिए अर्जित कर सकती है। उसकी शक्ति अनंत है और उसका शिकंजा फौलादी है। लेकिन यह बात कम ही समझ में आती है कि इस धार्मिक मान्यता को इतनी बढि़या किस्म की अश्व-शक्ति कैसे और कहां से प्राप्त होती है? इसे समझने के लिए इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस धार्मिक मान्यता को यह शक्ति दो स्रोतों से मिलती है।
सर्वप्रथम तो यह कि जो धार्मिक है, वह सामाजिक भी है। इस बारे में प्रो. डर्कहीम के विचार निम्नलिखित हैंः
अगर कोई वर्ग कुछ मान्यताओं को स्वीकार कर उनसे जुड़े रीति-रिवाजों