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हिंदू समाज की आधार-शिला

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के पालन करने का संकल्प करता है तो वे धार्मिक आस्थाएं उस वर्ग के लिए

समान होती हैं। उन्हें उस वर्ग के सदस्य अलग-अलग ग्रहण नहीं करते, वे उस

समस्त वर्ग के लिए होती हैं, और इन्हीं के कारण वह वर्ग एक इकाई बनता

है, उनमें परस्पर एकता की भावना उत्पन्न होती है, जो केवल इस कारण कि

उनकी एक समान आस्था होती है। ख्1,

दूसरे, जो धार्मिक है, वह पावन है। मैं पुनः प्रो. डर्कहीम की साक्षी देता हूं। उनके विचार निम्नलिखित हैं ख्2, ः

विश्व में जो भी धर्म हैं, वे चाहे सरल हों या जटिल, उन सभी में

एक बात समान मिलती है, और वह यह कि वे उन सभी वास्तविक अथवा

काल्पनिक विषयों को जिनके बारे में मनुष्य सोच सकता है, दो वर्गों में बांट

देती है, जो एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इन्हें अलग-अलग नाम दिए जाते

हैं। हम इन्हें अपवित्र और पवित्र शब्दों से व्यक्त कर सकते हैं।.... मानव

चिंतन के समूचे इतिहास में इन दो श्रेणियों के रूप में वर्गीकरण का ऐसा

कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता, जो एक-दूसरे से इतना नितांत भिन्न हो

या आमूलतः परस्पर इतना विपरीत हो। परंपरा से भला और बुरा कहकर

वैपरीत्य का जो भाव व्यक्त किया जाता है, वह और कुछ नहीं है, क्योंकि

अच्छा और बुरा एक ही वर्ग, यानी आचार-विचार के दो विभिन्न प्रकार हैं,

ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार स्वस्थता और अस्वस्थता एक ही तथ्य अर्थात्

जीवन के दो अलग-अलग पहलू हैं। पर पवित्र और अपवित्र की कल्पना

सर्वत्र सदा ही मानव-मन ने दो नितांत अलग-अलग श्रेणियों के रूप में

की है। उनके संबंध में उसने दो अलग-अलग जगत की संकल्पनाएं की

है, जिनका एक-दूसरे से कोई वास्ता नहीं। .... धार्मिक आस्थाएं वे रूप

हैं, जो पवित्र वस्तुओं की प्रकृति और उन संबंधों को व्यक्त करते हैं,

जो इन वस्तुओं में परस्पर या अपवित्र वस्तुओं के साथ इन वस्तुओं के

होते हैं, (जब कि) आचार वे नियम हैं, जो यह निर्धारित करते हैं कि

इन पवित्र विषयों के संदर्भ में किस प्रकार मनुष्य स्वतः सुख-शांति प्राप्त

कर सकता है।

इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सामाजिक, धार्मिक तथा कर्मकांडीय आस्थाओं का आपस में गहरा संबंध है। जो धारणाएं धार्मिक हैं, वे सामाजिक हैं। पर

  1. एलीमेंट्री फार्म्स ऑफ दि रिलिजस लाइफ, पृ. 37-40

  2. वही, पृ. 43