68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जो सामाजिक हैं, वे सारी-की-सारी धार्मिक नहीं हैं। जो धारणाएं कर्मकांडीय है, वे सामाजिक हैं, भले ही जो सामाजिक हों वे सारी-की-सारी कर्मकांडीय न हों। दूसरी ओर, जो धार्मिक हैं, वह सामाजिक भी हैं और कर्मकांडीय भी।
धार्मिक आस्थाओं के मान्य होने का एक आधार यह है कि धर्म एक सामाजिक वस्तु है और धार्मिक आस्थाएं सामाजिक आस्थाएं होती हैं। कोई वर्ग धार्मिक आस्थाओं को किसी व्यक्ति पर उसी प्रकार और उसी आधार पर आरोपित करता है, जिस प्रकार और जिस आधार पर वह अपने अन्य गैर-धार्मिक तथा विशुद्ध सामाजिक आस्थाएं आरोपित करता है। उद्देश्य उस वर्ग की अखंडता को बनाए रखना होता है। चूंकि वर्ग की अखंडता और उसकी धार्मिक आस्थाओं का आपस में चोली-दामन का संबंध होता है, अतः जितना प्रचंड और कठोर दंड धार्मिक आस्थाओं के उल्लंघन के लिए दिया जाता है, वह प्रायः उस दंड से अधिक कठोर तथा प्रचंड होता है, जो गैर-धाम्रिक आस्थाओं के उल्लंघन करने पर दिया जाता है। समाज की शक्ति आदेश स्वरूप होती है और उसके सामने व्यक्ति प्रायः बेबस होता है। धार्मिक आस्था के मामले में समाज की शक्ति का आदेशात्मक रूप इस भावना और अधिक प्रबल हो जाता है कि उसका उल्लंघन अधिक गंभीर कोटि का उल्लंघन है और वह धार्मिक आस्था को कोरी सामाजिक आस्था की अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति देता है।
धार्मिक मान्यता को कर्मकांड पुष्ट करता है। इस कर्मकांड का मूल उद्गम व्यक्ति, और समाज उसका गौण उद्गम होता है। धार्मिक मानवता के उद्गम के संबंध में समाज की वह भूमिका बड़ी विचित्र है। कर्मकांडीय आस्था व्यक्ति को धार्मिक आस्था से पालन के लिए तैयार करती है। उसके कारण यह आवश्यक नहीं रह जाता कि समूह अपने प्रभाव का उपयोग करे। यही कारण है कि धार्मिक मान्यता के मूल में स्थित कर्मकांडीय आस्था उसे इतना उच्च आसन प्रदान कर देती है कि वह अन्य सभी मान्यताओं को इतना लांघ जाती है कि वास्तव में उनकी जरूरत ही नहीं पड़ती। यही कारण है कि केवल धार्मिक मान्यता ही धार्मिक आस्थाओं की अखंडता को कायम रखने के लिए इतनी पर्याप्त हो जाती है कि काल और परिस्थितियां भी उस पर प्रभाव डालने में अक्षम सिद्ध हुई हैं। यह किस प्रकार होता है, उसे आसानी से समझा जा सकता है। पवित्रता व्यक्ति के मानस में आदर और श्रद्धा पैदा करती है। निश्चय ही अपिवत्रता के प्रति उसके मन में वैसा भाव पैदा हो ही नहीं सकता। प्रो. डर्कहीम के शब्दों मेंः
महान कर्म करने वाले व्यक्त्यिं के चारों ओर स्वतः एक सीमा रेखा बन
जाती है, जो (पवित्र के प्रति) धार्मिक श्रद्धा भावना से स्वभावतः भिन्न नहीं
होती। दोनों ही स्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिक्रिया एक समान होती है।