हिंदू समाज की आधार-शिला
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वह (व्यक्ति) महान व्यक्तियों और अपने बीच कुछ अंतर समझता है, वह उनसे
व्यवहार करते समय सावधान रहता है, वह उनसे बातचीत करते समय साधारण
मनुष्यों के प्रति व्यक्त व्यवहार से भिन्न भावभंगिमा और भाषा का प्रयोग करता
है।
पवित्रता श्रद्धा का भाव पैदा करती है। वह ऐसा भाव भी पैदा करती है, जिसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। जब कोई विश्वास किसी पवित्र वस्तु में आस्था के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो न तो उसका स्पर्श किया जा सकता है और न ही उसका खंडन अथवा प्रतिवाद किया जा सकता है। पवित्र वस्तु की आलोचना भी नहीं की जा सकती। पवित्रता संस्पर्श और विवाद से परे है। जब किसी व्यक्ति में ये भाव नख से शिख कर कूट-कूट-कर भर दिए जाते हैं, जब ये भाव उसके रोम-रोम में रम जाते हैं तो वह स्वयं उस वस्तु का पक्षधर वं संरक्षक बन जाता है, जिसके बारे में उसे सीख दी जाती है कि वह पवित्र है।
जाति के मामले में भी हिंदुओं ने भी हूबहू यही किया है। उन्होंने वेदों में जाति को स्थान दिया है। वेद पवित्र हैं, अतः जाति पर भी पवित्रता की मोहर लग गई है। यह कहना गलत होगा कि वेद पवित्र हैं, क्योंकि वे धर्म-सम्मत हैं। स्थिति यह है कि वे धर्म-सम्मत हैं, क्योंकि वे पवित्र हैं।
ऐसा प्रतीत हो सकता है कि हिंदुओं में वेदों के प्रति जो पवित्र भावना है, उसके लिए उन्होंने प्रत्यक्षतः कोई नाम नहीं दिया। वेद का सीधा अर्थ है, ज्ञान। हो सकता है कि ऐसा हो। लेकिन इस बारे में कोई संशय नहीं हो सकता कि वे वेदों को पवित्र मानते हैं। वास्तविकता तो यह है कि उन्होंने वेदों के लिए उस भाव से जो पवित्र शब्द से व्यक्त होता है, कहीं अधिक श्रद्धा तथा सम्मान जताने वाले शब्द का प्रयोग किया है। वे वेदों को ‘श्रुति’ कहते हैं। ‘श्रुति’ का अर्थ है, ईश्वर का वह शब्द, जिसे मनुष्य ने सुना (या ईश्वर द्वारा जिसे व्यक्त किया गया था)। आदिम धर्म में पवित्र उसे कहा गया है, जिसका निर्माण मनुष्य ने किया है। हिंदू धर्म में जो ईश्वर द्वारा निर्धारित किया गया, वह पवित्र है।
हिंदू वेदों को अपने धर्म का पवित्र ग्रंथ मानते हैं। वे वेदों को एक विशिष्ट स्थान देते हैं। हिंदुओं की मान्यता ख्1, है कि सृष्टि के चक्र होते हैं। इन्हें ‘कल्प’ कहते हैं। चक्र के अंत में, जल-प्रलय होती है और एक नए सृष्टि-चक्र का आरंभ होता है। हर कल्प के अंत में जल-प्रलय में वेदों का विनाश हो जाता है। हर कल्प के प्रारंभ में वे ईश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं। तदनुसार पिछले कल्प के अंत में प्रलय में वेद
- एम. कृष्णमाचारियर, क्लासिकल संस्कृत लिटरेचर, इंट्रोडक्शन, पृ. VII, VIII और 836