70 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नष्ट हो गए थे और वर्तमान कल्प के प्रारंभ में जो कृत युग से हुआ, ईश्वर ने वेदों को ट्टषियों को व्यक्त किया। हिंदू वेदों को नित्य (सनातन), अनादि (प्रारंभ-रहित) और अपौरुषेय (अमानवीय) मानते हैं। संक्षेप में, वेद ईश्वर के शब्द हैं और वे मानव के लिए ईश्वर के आदेश हैं।
वेदों को यदि ‘श्रुति’ न कहा जाता, तो भी वे अनिवार्यतः पवित्र कहे जाते। प्रो. मैक्स मूलर ख्1, ने धर्मों का विभिन्न प्रकार से वर्गीकरण किया है। उनका एक वर्गीकरण है, प्रकृत तथा व्यकत। एक अन्य वर्गीकरण है, व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय। उनका एक तीसरे प्रकार से, अर्थात् उन्हें अनीश्वरवादी, देववादी, द्वैतवादी, बहुदेववादी, एकेश्वरवादी, एकैकाधिदेववारी और जड़ात्मवादी के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। उन्हें सत् या असत् के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। इसके दो और वर्ग हो सकते हैं, जैसे ग्रंथाधीन धर्म या ग्रंथहीन धर्म। इस प्रकार धर्मों के वर्गीकरण की सूची संभवतः सर्वांग दृष्टि से पूर्ण नहीं हो सकती, क्योंकि इनका एक और प्रकार से भी वर्गीकरण किया जा सकता है, अर्थात् वे धर्म जिनके कोई संस्थापक हैं और वे धर्म जिनके कोई संस्थापक नहीं हैं।
इन वर्गीकरणों का दो प्रकार के वर्गीकरण को छोड़कर सामाजिक महत्व है। ये दो प्रकार हैं, प्रकृत व व्यक्त और लिखित धर्म व अलिखित धर्म। इनके कार्य अलग-अलग हैं, भले ही इनके कार्यों में जो अंतर है, उसकी ओर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता।
अलिखित धर्म की तुलना में लिखित ग्रंथबद्ध धर्म की स्थिति निस्संदेह अच्छी होती है। लिखित धर्म ऐसा धर्म होता है, जिसकी लिखित व्यवस्था होती है। जिस धर्म की व्यवस्था लिखित नहीं होती, वह अलिखित धर्म होता है। लिखित धर्म यह धारणा पैदा करता है कि वह सच्चा है, पर अलिखित धर्म ऐसा नहीं कर सकता। लिखित धर्म की तुलना में अलिखित धर्म झूठा होने की हीन भावना से ग्रस्त रहता है। मैक्स मूलर ख्2, बताते हैं, ‘केवल लिखित धर्म ही सच्चे धर्म समझे जाते हैं। चाहे उनमें झूठे सिद्धांतों का समावेश ही क्यों न हो, फिर भी उनके प्रति ऐसा भावना रखी जाती है कि उनके बारे में बहुत कुछ क्षम्य समझा जाता है, जब कि अलिखित या निरक्षर धर्मों की भीड़ की तो बिल्कुल ही विचारणीय नहीं समझा जाता।’ इससे यह सहज ही समझा जा सकता है कि अलिखित धर्म की अपेक्षा लिखित धर्म को श्रेष्ठ माना गया है। जब कोरे कागज पर लिखे काले अक्षरों को सत्य का पर्याय मान लिया गया है तो यह सहज की स्पष्ट हो जाता है कि जो धर्म लिखित है, जो सफेद पर कुछ लिखा है, वह असत् नहीं है। लेख सत्य का प्रमाण-पत्र बन जाता है। अलिखित धर्म के पास प्रमाण-पत्र नहीं होता।
साइंस आफ रिलीजन, में प्रस्तावना देखिए।
नेचुरल रिलीजन, पृ. 549