हिंदू समाज की आधार-शिला
71
लिखित धर्म का सामाजिक महत्व इस बात में है कि वह लोगों के मानस में यह धारणा जगाता है कि पुस्तक में लिखा धर्म सच्चा है और इस प्रकार लोगों के मन पर हावी हो जाता है। वह लोगों पर धर्म की सत्ता व शक्ति का सिक्का जमाता है और उनमें स्वेच्छापूर्वक आज्ञापालन का भाव जगाता है।
लेकिन कोई धर्म इस कारण कितना भी सच्चा क्यों न प्रतीत हो कि वह एक लिखित धर्म है, उसका यह रूप उसे पतन से नहीं रोक सकता, यदि उसमें अनुभव के आधार पर गलत आस्थाएं एवं अनुष्ठान घर कर गई हों। मनुष्य सिद्धांत को लेकर गलती कर सकता है, पर उसकी व्यावहारिक अनुभूतियां उसे लंबे अर्से तक गलत सिद्धांत के पीछे चलते रहने नहीं देंगी। अतः यदि किसी समाज की धार्मिक आस्थाएं सच्ची न हों, तो अंततः व्यवहार में धर्म को उसके रास्ते से हटना ही होगा।
यहीं पर प्रकृत धर्म और उद्घाटित धर्म के बीच के विभेद का सामाजिक महत्व सिद्ध होता है। उद्घाटित धर्म प्रकृत धर्म से श्रेष्ठ कहा जाता है। अनेक लेखकों ने कतिपय ऐतिहासिक प्रकार के धर्मां के संदर्भ में प्रकृत धर्म की चर्चा की है। एक ऐसा धर्म जो लोगों के विकास के साथ-साथ पनपा हो, जो लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार परस्पर आदान-प्रदान से और जिस पर्यावरण में वे रहते हैं, उसमें से उपजा हो। प्रकृत धर्म का निर्माता है, मनुष्य। उसकी मान्यता है, मनुष्य में पाई जाने वाली सत्य की भावना और उसकी अंतरात्मा की आवाज। उद्घाटित धर्म मनुष्य के प्राधिकार पर नहीं टिका है। वह मानव की नहीं, बल्कि ईश्वर की कृति है। उसकी मान्यता का कारण है, ईश्वर जो परम सत्य है और परम शिव है। उद्घाटित धर्म का उद्देश्य धर्म को पवित्रता प्रदान करना है, जिससे उसका न उल्लंघन किया जा सके और न उसकी आलोचना ही की जा सके।
वेदों के दोनों गुण हैं। उन्हें वह श्रेष्ठ स्थिति प्राप्त है, जो अलिखित धर्म की तुलना में लिखित धर्म को मिलती है। उन्हें वह श्रेष्ठ स्थिति भी प्राप्त है, जो प्रकृत धर्म की तुलना में उद्घाटित धर्म को मिलती है।
इस चर्चा का उद्देश्य इस बात पर बल देना है कि चूंकि वेदों में जाति का उल्लेख है, अतः स्वतः ही उसे, अर्थात् जाति को लिखित पुस्तक की प्रामाणिकता और ईश्वरीय वचन होने की मान्यता प्राप्त हो जाती है। वेदोक्त योजना होने के फलस्वरूप उसे दोहरी सुरक्षा प्राप्त है। बिना किसी अपवाद के हर व्यक्ति को जाति को स्वीकार करना होगा, क्योंकि वह ईश्वरीय सत्य है और जो कोई उसकी आलोचना करने की भूल करेगा, वह पवित्र को अपवित्र करने का अपराधी होगा, क्योंकि वह पवित्र है।
यह है, जाति के संबंध में हिंदू का दृष्टिकोण और एक हिंदू उस आधुनिक व्याख्या से सहमत नहीं है, जो रिजले ने प्रजातीय सिद्धांत के आधार प्र की है, जो