72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सेनार्त ने अपने व्यवसायगत सिद्धांतों में की है, और जो नेस्फील्ड ने अपने वृत्तिमूलक सिद्धांत द्वारा की है। वह जानता है और मानता है कि जाति की रचना तो ईश्वर ने ही की होगी, क्योंकि वेदों में इसका उल्लेख है और वेद श्रुति हैं, अथवा ईश्वर का वचन है। अतः जाति सनातन और सत्य है।
जब भी ब्राह्मणों को जाति का विरोध करने वालों की आलोचना का उत्तर देने के लिए चुनौती दी गई, तब-तब उन्होंने उसके पक्ष में यही बातें कहीं कि जाति एक दैवी और पवित्र विधान है, तथा उसे सनातन रहना चाहिए। जाति संबंधी यह दृष्टिकोण उस विवाद में और भी स्पष्ट हो जाता है, जिसमें एक ओर ब्राह्मण और दूसरी ओर बुद्ध और उनके अनुयायी थे ख्1, ः
यदि एक बार यह आस्था जड़ जमा ले कि न केवल ट्टषियों के सहज
उद्गारों, बल्कि ब्राह्मणों के प्रखर सिद्धांतों पर भी जन्म दैवी स्रोत से हुआ और
इस कारण वे मानवीय तर्क से परे हैं, तो स्पष्ट है कि वेदों के पवित्र प्रमाण
के आधार पर ब्राह्मणों ने अपने लिए जिन विशेषाधिकारों की मांग की, उनका
विरोध धर्मद्रोह हो गया और जहां ब्राह्मणों के सिद्धांत लोक-धर्म या यूं कहें कि
राज-धर्म बने तो राज्य के परंपरागत कानूनों के सामने ऐसा विरोध होना असंभव
है। ब्राह्मणों ने स्वयं इस बात की सावधानी बरती कि लोग श्रुति की दैवी सत्ता
को स्वीकार करें, बजाए इसके कि ट्टषियों के सिद्धांत अपनी मूल सहजता और
शुद्धता के कारण स्थापित हो जाएं। दर्शनिक चर्चाओं में उन्होंने अधिक-से-अधिक
स्वतंत्रता दी। यद्यपि पहले पहल केवल तीन दर्शन-प्रणालियों को (दो मीमांसाएं
और न्याय) शास्त्र-सम्मत माना गया, पर शीघ्र ही उनकी संख्या बढ़ाकर छह
की दी गई, ताकि उनमें वैशेषिक, सांख्य और योग-प्रशाखाओं का भी समावेश
हो सके। महत्वपूर्ण मुद्दों पर विरेधी विचारों को उस सीमा तक सहन किया
गया, जिस सीमा तक उनके व्याख्याता किसी प्रकार अपने सिद्धांतों का मेल
वेदों की ट्टचाओं से मिला देते थे। यदि इतना भी स्वीकार कर लिया जाता कि
इंद्रियों की अनुभूति और तर्क के प्रतिपादन के अलावा वेदोक्त उद्घाटन (श्रुति)
भी मानव-ज्ञान के लिए सच्चा आधार प्रस्तुत करता है तो अन्य सभी मुद्दे गौण
हो जाते थे। लौकिक तथा अलौकिक जगत, सृजनहार और सृजित, दैवी तथा
मानवीय प्रकृति के बीच क्या रिश्ता है, इस बारे में दार्शनिकों को सभी संभव
दृष्टिकोण प्रस्तुत करने की पूरी छूट दी गई। ऐसा पांडित्यपूर्ण रचनाओं से ब्राह्मण
जाति को कोई खतरा पैदा नहीं हो सकता था। न ही उन्हें बुद्ध शाक्य मुनि के
दार्शनिक सिद्धांतों में प्रचुरता से उपलब्ध उस नास्तिकता से कोई भय था, जिसके
- पृ. 88 तक निम्नलिखित उद्धरणों के स्रोत मूल अंग्रेजी की पांडुलिपि में नहीं दिए गए हैं - संपादक