हिंदू समाज की आधार-शिला
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सूत्र कपिल के कट्टर निरीश्वरवाद में मिलते हैं। उनका वास्तविक अपराध यह था कि उन्होंने ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों तथा उनकी कुरीतियों का विरोध किया था। इन कुरीतियों को वेदों की दैवी सत्ता ने मान्यता प्रदान की थी। बुद्ध ने अधिकारो तथा कुरीतियों के मूलाधार दैवी सिद्धांत पर प्रहार किया। उनके विरुद्ध संक्षिप्त-सा आरोप था-वह नास्तिक बहिष्कृत आदि हैं।
बुद्ध क्षत्रिय थे। उनका गोत्र उच्च था। वह राज-परिवार के थे। वह अपनी जात में पहले व्यक्ति नहीं थे, जिसने ब्राह्मणों के आधिपत्य का विरोध किया था। बुद्ध से सदियों पूर्व विश्वामित्र को भी, जो बुद्ध की भांति क्षत्रिय जाति के थे, ब्राह्मणों के एकाधिकार के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन उस प्राचीन काल में ब्राह्मणों की स्थिति अजेय नहीं थी और विश्वामित्र ने क्षत्रिय होने पर भी संघर्ष करके स्वयं अपने तथा अपने परिवार के लिए वे अधिकार प्राप्त किए जो उससे पूर्व केवल ब्राह्मण जाति की ही बपौती थे। ब्राह्मण ग्रंथों में विदेह राजा जनक की कथा दी गई है। उन्होंने भी ब्राह्मणों के परंपरागत अधिकार को स्वीकार नहीं किया और पुरोहितों की मध्यस्था के बिना यज्ञ करने के अपने अधिकार पर आग्रह किया था। इन दो व्यक्तियों तथा बुद्ध के व्यक्तिगत आचरण में कितना भी महान अंतर क्यों न रहा हो, पर उनके विरोध का मुख्य सिद्धांत तो एक जैसा था। वे स्वार्थी पुरोहित वर्ग के एकाधिकार के विरुद्ध समान रूप से संघर्ष कर रहे थे।
लेकिन जहां विश्वामित्र ने केवल अपने समूचे जाति-वंश और अपने परिवार के अधिकारों के लिए संघर्ष किया था और ज्यों ही उन्हें पौरोहित्य का अधिकार मिल गया। वे संतुष्ट हो गए थे और जहां जनक, याज्ञवल्क्य और अन्य ब्राह्मणों से सत्कार मिलने मात्र से संतुष्ट हो गए थे, वहां उनके बाद होने वाले सुधारकों को लगता है कि ऐसी कोई सफलता नहीं मिली और वे परास्त होकर ब्राह्मणों के पक्षधर हो गए, तथापि लोगों के मन में असंतोष पनपते रहे। भारत के इतिहास में एक काला अध्याय मिलता है। बताया गया है कि परशुराम ने सभी क्षत्रियों का विनाश कर दिया। यह ब्राह्मणों की वर्चस्वता का श्रीगणेश था। जहां तक हम भारत के इतिहास और उसकी परंपराओं को जानते हैं, भले ही लगता हो कि ब्राह्मणों ने कभी भी राजसत्ता की कामना नहीं की, लेकिन उनकी जाति वास्तव में सदा ही शासक जाति रही। उनकी पुरोहिताई को दैवी अनुकंपा प्राप्त करने का एकमात्र साधन होने का गौरव प्रदान किया गया, उनके सिद्धांतों को अकाट्य माना गया, उनके देवी-देवताओं को सच्चे देवी-देवता माना गया और उनकी वाणी इतनी सशक्त समझी गई कि वह ट्टषियों की सीधी-सादी अभिव्यक्तियों और ब्राह्मण