3. हिंदू समाज की आधार-शिला - Page 89

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लेखकों की बेतुकी रचनाओं को दैवी कहकर प्रमाणित करने लगे। लेकिन इसके बाद ब्राह्मणवाद का ”ास होने लगा। किसी अन्य देश की भांति भारत में भी लोग सत्य पर अपना एकाधिकार घोषित करने वाले के आगे घुटने क्यों टेकते और उन्हीं लाखों लोगों ने, जो बड़े धीरज के साथ राजनीतिक तानाशाही का बोझ ढो रहे थे, बौद्धिक बर्बरता की बेडि़यों के बंधन को तोड़कर फेंक दिया। विश्व के एक प्राचीनतम धर्म का जुआ उतार कर फेंकने के लिए यह पर्याप्त था कि कोई एक व्यक्ति पृथ्वी के देवताओं (भूदेव) की सत्ता को चुनौती दे और ईश्वर के घृणित तथा पददलित प्राणियों के बीच इस सहज सत्य का प्रचार करे कि पुरोहितों की पुरोहिताई और उन ग्रंथों में आस्था रखे बगैर भी मोक्ष संभव है, जिन्हें इन्हीं पुरोहितों ने श्रुति की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति था ‘बुद्ध’, एक शाक्य मुनि। अब यदि हम देखें कि किस प्रकार बुद्ध के सिद्धांतों का प्रतिकार ब्राह्मणों ने किया है, तो यह सच है कि यत्र-तत्र अपनी दार्शनिक रचनाओं में उन्होंने तर्क की दुहाई देकर उनकी कुछ तात्विक सूक्तियों का प्रतिकार करने का प्रयास किया है, जैसे इसी प्रकार का एक प्रयास वेदांत-सूत्रों पर अपनी टिप्पणी में वाचस्पति मिश्र ने किया है। बुद्ध के इन सिद्धांतों पर कि ‘अस्ति’ और ‘नास्ति’ आदि जैसी धारणाएं विवाद योग्य नहीं हैं, टिप्पणी करते हुए वाचस्पति कहते हैं कि इन धारणाओं की चर्चा में ही उनकी संकल्पना की संभावना निहित है। इतना ही नहीं, इस बात को दृढ़ता से कहने में कि तर्क उन्हें स्वीकार नहीं करता, यह निहित है कि वे यथार्थ में तर्कपरक हैं और यह सिद्ध होता है कि मन ‘नास्ति’ से विपरीत ‘अस्ति’ की कल्पना कर सकता है।

लेकिन ये वे सामान्य हथियार नहीं थे, जिन्हें बौद्ध धर्म से लड़ने के लिए ब्राह्मणवाद ने अपनाया। मुख्य आपत्ति सदा ही यह रही है कि बुद्ध के उपदेश सत्य नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें श्रुति अथवा ईश्वरीय मान्यता नहीं मिली है। ब्राह्मण, जाति के रूप में ‘अस्ति और नासित’ तथा बुद्ध के संपूर्ण दर्शन को तुरंत स्वीकार कर लेते हैं, जैसा कि उन्होंने इस सांख्य दर्शन के बारे में किया, जो अति महत्वपूर्ण मुद्दों के बारे में वेदांत का खुला विरोध करता है। लेकिन जहां सांख्य मत के संस्थापक कपिल ब्राह्मणीय कसौटी को स्वीकार कर लेते हैं और

खुलेआम कहते हैं कि श्रुति की सत्ता तर्क और अनुभव से परे हैं, वहां बुद्ध या तो अपने अभिधर्म (दर्शन) के कारण या फिर कुछ और अधिक महत्वपूर्ण नैतिक तथा धार्मिक सिद्धांतों (विनय) के कारण ऐसा नहीं करते। निस्संदेह उनके लिए यह दर्शाना सरल होता है कि उनके कुछ सिद्धांत वेद की ट्टचाओं में मिलते हैं। इसका कारण यह है कि वेद में मानव-मन के सभी संभव रंग-रूपों की सहज अभिव्यक्ति हुई है। यदि उन्होंने केवल अपने कुछ नीति वचनों के बारे में ऐसा