हिंदू समाज की आधार-शिला
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कर लिया होता, जैसे ‘तू हत्या नहीं करेगा’, ‘तू मद्यपान नहीं करेगा’, ‘तू खड़े होकर खाएगा’, तो ब्राह्मण तुरंत अन्य सिद्धांतों की उपेक्षाकर देते, उनकी जो भी बुद्ध के निर्वाण के बाद व्यवहार में आए, जैसे ‘जो स्वर्ग की कामना करता है, उसे प्रेत-पूजा करनी होगी’, ‘उसे अपने सिर का मुंडन करना होगा’, आदि। चूंकि उन्होंने ऐसा नहीं किया, अतः ब्राह्मण श्रुति को साक्ष्य बनाकर बुद्ध के सिद्धांतों की सत्यता को नकारते रहे।
तर्क की यह पद्धति निश्चय की कुछ आकर्षक रही होगी, क्योंकि हम देखते हैं कि बाद में बौद्धों ने भी अपनी पवित्र रचनाओं को वैसे ही दैवी रचनाएं बताने का प्रयास किया, जैसा कि ब्राह्मणों ने वेदों के संबंध में किया था। इसका एक मजेदार उदाहरण निम्नलिखित चर्चा में मिलता है। यह कुमारिल की ‘तंत्र-वर्तिका’ से उद्धृत है। यहां प्रतिवादी (पूर्व पक्ष) कहता है कि जिस तर्क से यह सिद्ध किया जाता है कि वेद मनुष्यों की कृतियां नहीं हैं, उसी तर्क से यह सिद्ध किया जा सकता है कि शाक्य के उपदेश भी दैवी उपदेश नहीं हैं। वह कहता है कि शाक्य की प्रामाणिकता निर्विवाद है, क्योंकि उनके उपदेश स्पष्ट और बोधगम्य हैं। शाक्य उनके अन्वेषक नहीं हैं, वे तो केवल उनका आदेश करते हैं। शाक्य के सिद्धांतों के साथ किसी रचनाकर का नाम नहीं जोड़ा गया है, अतः वेदों की भांति ही उनमें वह अस्थिरता नहीं है, जो मनुष्यों की कृतियों में मिलती है। निष्कर्ष के रूप में वह कहता है कि वास्तव में वेद की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए जो तर्क मीमांसकों ने प्रस्तुत किए हैं, उसी प्रकार बुद्ध के सिद्धांत की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है। इस पर पुरातनपंथी कुमारिल क्रुद्ध हो जाते हैं और कहते हैंः
ये शाक्य वैशेषिक तथा अन्य विधर्मी जिनकी बोलती निष्ठावान मीमां
सकों ने बंद कर दी है, हमारे शब्दों को तुतला कर बोलते हैं, मानो वे
छाया को पकड़ने का प्रयास कर रहे हों। वे कहते हैं कि उनके पवित्र
ग्रंथ शाश्वत हैं, लेकिन उनके दिमाग खोलने हैं, और वे केवल घृणा के
कारण वेद को अत्यंत प्राचीन ग्रंथ नहीं मानते। और ये भावी तार्किक
यह भी कहते हैं कि उनके लिए कुछ सिद्धांत (जिन्हें उन्होंने हमसे
चुराया है) वेद से नहीं लिए गए है, जैसे सबके प्रति दया का सिद्धांत,
क्योंकि बुद्ध की अधिकांश उक्तियां वेद के नितांत प्रतिकूल हैं। अतः
इस मुद्दे पर भी वे अपनी सत्यता सिद्ध करना चाहते हैं। उन्हें मालूम
है कि नैतिक अलौकिक विषयों में मानवीय निर्देशों का कोई प्राधिकार
नहीं है, अतः वे वेद की सनातनता के बारे में हमारे तर्क की नकल