3. हिंदू समाज की आधार-शिला - Page 91

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

करके अपनी कठिनाई को ढांपना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मीमांसकों

ने यह सिद्ध कर दिया है कि मानवों की कोई भी उक्तियां अलौकिक

विषयों पर कोई प्राधिकार नहीं कर सकतीं। ये भी जानते हैं कि वेद के

प्राधिकार का खंडन नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसके दैवी उद्गम

के संबंध में प्रस्तुत प्रमाणों के विरुद्ध उनके पास कोई प्रमाण नहीं हैं।

दैवी-उद्गम ने मानवीय उद्गम की समूची संभावना का निराकरण कर

दिया है। अतः उनके हृदय उनके अपने ही शब्दों से विदीर्ण हो रहे हैं।

उनके शब्द बच्चों के बचकाने ज्ञान जैसे हैं और उनके पास कोई उत्तर

नहीं है, क्योंकि उनके बेतुके तर्कों के छलावे का पर्दाफाश कर दिया गया

है। अब वे उस मूर्ख विवाहार्थी जैसी वाणी बोलने लगे हैं, जो वधू पक्ष

से कहता है, ‘मेरा परिवार भी उतना ही उत्तम है, जितना कि आपका।’

इसी प्रकार वे बंदर की भांति अन्य लोगों की वाणियों की नकल करके

अपने ग्रंथों के सनातन अस्तित्व को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हैं।

और यदि उन्हें चुनौती दी जाती है और उनसे कहा जाता है कि यह तो

हमारा तर्क है, तो वे उपद्रव मचाते हैं और कहते हैं कि हमने, अर्थात्

मीमांसकों ने, उनसे चुरा लिया है। जिस व्यक्ति की समूची योजना चौपट

हो गई है, जो व्यक्ति बेतुकी बातें करने लगता है, और जो अपने प्रतिद्वंदी

को धोखा देने का प्रयास करता है, वह कभी भी नहीं थकता और उसे

कभी भी शांत नहीं किया जा सकता।

इस लंबे-चौड़े भाषण के अंत में कुमारिल कहते हैं, ‘अधिक संगत

बात यह हैः जो बौद्ध हर वस्तु को केवल अस्थाई मानते हैं, उनका

किसी सनातन उद्घाटन से क्या वास्ता?’

उक्त वाद-विवाद से यह स्पष्ट हो जाएगा कि जाति का जन्म धर्म से हुआ है। धर्म ने उसको प्रतिष्ठित किया और उसे पवित्रता प्रदान की। इस कारण यह कहना उचित है कि धर्म ही वह पक्की नींव है, जिस पर हिंदुओं ने अपना सामाजिक ढांचा

खड़ा किया है।

क्या इससे पता नहीं चलता कि जाति एक अति निराली संस्था है और उसकी तुलना अन्य सामाजिक संस्थाओं से नहीं की जा सकती। मैं यह कहने की धृष्टता करता हूं कि जो भी यह धारणा व्यक्त करता है कि जातिप्रथा में कुछ भी विचित्रता नहीं है, वह जातिप्रथा को बिल्कुल भी नहीं जानता। मैं पुनः कहता हूं कि जाति एक पवित्र संस्था है, यही उसकी विशिष्टता है। जाति एक पवित्र संस्था है, उसकी यही विशेषता उसे बाध्यकारी बनाती है।