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हिंदू समाज की आधार-शिला

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सामाजिक प्रगति पर पवित्र ग्रंथों वाले धर्म के प्रभावों के बारे में प्रो. मैक्स मूलर ने कुछ बड़ी शिक्षाप्रद बाते कहीं हैं। वह कहते हैंः

किंतु इतिहास हमें एक और सबक सिखाता है, अर्थात् यह ठीक ही है कि कानून की संहिताएं एक प्रकार की पूजनीय वस्तुएं बन जाती हैं। वे अपेक्षा करती हैं कि निर्विवाद रूप से उनका अंधानुकरण किया जाए। उनके ऐतिहासिक अथवा नैसर्गिक उद्गम को प्रायः पूर्णतया भुला दिया जाता है। सद्-असद्, उचित-अनुचित संबंधी पुरानी धारणाओं को एक संकल्पना में जो लिखित और कानूनी होती हैं, निहित कर दिया जाता है, उनकी पृथक सत्ता को समाप्त कर दिया जाता है।

पौर्वात्य धर्मों का अध्ययन भी हमें यही शिक्षा देता है। पवित्र ग्रंथ प्रायः एक प्रकार की पूजनीय वस्तु बन जाते हैं। यह अपेक्षा होने लगती है कि उनमें लोगों की स्वतः श्रद्धा होगी और यह श्रद्धा अटूट होगी। उनके ऐतिहासिक अथवा नैसर्गिक उद्गम को प्रायः पूर्णतया भुला दिया जाता है। सद् तथा दैवी संबंधी पुराने विचारों को एक ही लिखित तथा शास्त्र-सम्मत विचार में लगभग आत्मसात् कर लिया जाता है।

इतिहास हमें एक तीसरी शिक्षा भी देता है। यदि कानून व्यवसाय बन जाता है और उसे यांत्रिक कठोरता से लागू किया जाता है तथा उसमें सद् और असद् की प्रबल मानवीय अनुभूति का ध्यान नहीं रखा जाता, तो जिस कानून के अधीन कोई नागरिक रहता है, उसके प्रति उसके दायित्व-बोध के मृत हो जाने की शंका रहती है। इसी तरह इस बात का भी खंडन नहीं किया जा सकता है कि यदि कानून व्यवसाय बन जाता है और उसे औपचारिक कठोरता से लागू किया जाता है और उसमें सद् और असद् की प्रबल मानवीय अनुभूति का ध्यान नहीं रह जाता, तो जिस धर्म के अधीन कोई व्यक्ति रहता है, उसके प्रति उसके दायित्व-बोध को भी मृत हो जाने का वैसा की खतरा नहीं रहता।

लेकिन मेरा उद्देश्य पवित्र ग्रंथों से पैदा होने वाले खतरों को दर्शाना नहीं है, अपितु उस पूर्वाग्रह का प्रतिरोध करना है, जो कि उन धर्मों के प्रति व्यापक रूप से प्रचलित है, जिनके कोई पवित्र ग्रंथ नहीं हैं।

लिखित तथा अलिखित धर्मों के बीच भारी अंतर है और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से यह अंतर विभाजन का एक वास्तविक आधार प्रस्तुत करता है, लेकिन चूंकि लिखित धर्मों के कुछ लाभ हैं, अतः हमें यह नहीं सोच लेना चाहिए कि अलिखित धर्म केवल बहिष्कृत धर्म हैं। इसमें संदेह नहीं कि उनके कुछ दोष हैं, पर उनके कुछ गुण भी हैं।