78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
एक उत्तरी अमरीकी मूल निवासी ने बहस के दौरान ईसाई मिशनरी को अपने धर्म और श्वेत मानव के धर्म के बीच जो अंतर बताया, वह इस प्रकार हैः
परमात्मा ने दो धर्म बनाए, जिनमें एक लिखित है। यह लिखित धर्म
श्वेत लोगों के पथ-प्रदर्शन के लिए है, जो उसके उपदेशों का पालन
करके श्वेत मानव के स्वर्ग में जाएंगे। दूसरा धर्म हमारे हाथों में है, हमारा
यह धर्म आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है। और हम लोग जो
उसे प्रकृति में देखते हैं, उसकी वाणी को सुनते हैं और अंततः उसे स्वर्ग
के उस पार जाकर खोज लेते हैं।
अब जो धर्म दिल व दिमाग में है, आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है, उसी को हम नैसर्गिक धर्म कहते हैं। उसकी जड़ें होती हैं प्रकृति में, मानवीय प्रकृति में और उस बाह्य प्रकृति में जो हमारे लिए अवगुंठन भी है और अभिव्यक्ति भी। वह उन्मुक्त है। वह मानव-मन के विकास के साथ-साथ पनपता है और स्वयं को हर युग की जरूरतों के अनुकूल ढाल लेता है। वह नहीं कहता, ‘तू ऐसा ही करेगा’, बल्कि कहता है, ‘मैं करूंगा।’ ऐसा नहीं है कि इन नैसर्गिक अथवा अलिखित धर्मों में निश्चित सिद्धांत और रीति-रिवाज नहीं होते। आस्था, नैतिकता और अनुष्ठान संबंधी मामलों में सामान्यतः उनमें भी कोई-न-कोई पुरोहित होता है। लेकिन उनमें कुछ भी कठोर और अपरिवर्तनीय नहीं होता। उनमें चिंतन का कोई बंधन नहीं होता। त्रुटि का पता लगने पर उसका परिष्कार होता है, नए सत्य का बोध होने पर उसे स्वीकार किया जाता है, उसकी परीक्षा होती है। लेकिन यदि एक बार उसे पुस्तक का आकार मिल जाए, श्वेत पर कुछ काला अंकित हो जाए तो प्रलोभन भारी ही नहीं, बल्कि अति सम्मोहक हो जाता है। मानवीय प्राधिकार के साथ उसे लागू करने का प्रलोभन बढ़ जाता है। ताकि उसे अजेय और मानव तर्क से परे ठहराया जा सके। हम भली-भांति समझ सकते हैं कि क्यों प्राचीन वैदिक कवियों ने अपनी ट्टचाओं को ईश्वर-प्रदत्त अथवा श्रुतियां अथवा अपौरुषेय कहा। लेकिन नई पीढ़ी ने इन अभिव्यंजनाओं को एक नया अर्थ दे डाला और अंततः वेद के हर विचार, शब्द और अक्षर पर ‘ईश्वर-प्रदत्त’ अथवा ‘श्रुति’ का ठप्पा लगा दिया। वैदिक धर्म पर यह सैधांतिक प्रहार था, क्योंकि जो पनप और बदल नहीं सकता, उसका विनाश निश्चित है। अलिखित धर्मों को इस प्रकार का कोई खतरा नहीं होता।
ऐसे ही उदगार सर विलियम म्यूर के हैं। इस्लाम की चर्चा करते समय उन्होंने धर्म की पवित्र संहिताओं से उत्पन्न होने वाले खतरों को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। वह कहते हैं ख्1, ः