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हिंदू समाज की आधार-शिला

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मुहम्मद का धर्म चारों ओर से इस तरह ढका हुआ है कि वह कभी उभर

ही नहीं सकता। आरंभ के दिनों उसमें जितनी सुनम्यता थी, उससे अधिक की

अब उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। अब वह अत्यंत कड़ा हो गया है। अब वह

मानव-जाति की विभिन्न परिस्थितियों, आवश्यकताओं और विकास-क्रमों के

अनुरूप न तो स्वयं को, न ही अपने अनुयायियों को ढाल सकता है, और न उन्हें

उनके अनुरूप स्वयं को ढालने के लिए विवश कर सकता है।

जिस किसी व्यक्ति को मानवता की प्रगति में रुचि है, वह धर्म की पवित्र संहिताओं के सामाजिक दुष्परिणामें के बारे में ऐसी ही प्रतिक्रिया किए बिना नहीं रहेगा। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि पवित्र संहिताओं वाले धर्मों के वर्ग के पुनः वर्ग बन सकते हैं। खेद है कि प्रो. मैक्स मूलर ने इस मामले पर और आगे विचार नहीं किया। इस पर और अधिक विचार होना चाहिए, क्योंकि यह एक बहुत ही असली भेद को उद्घाटित करता, जो धर्म की पवित्र संहिता वाले हिंदुओं को उन अन्य लोगों से अलग करता है, जिनके पास भी वैसी ही धर्म की पवित्र संहिता है। यह तब और स्पष्ट हो जाएगा, जब हम विभिन्न धर्मों की जांच कर उन विषयों को ढूंढ निकाले, जिन्हें इन धर्मों ने पूजा और श्रद्धा की वस्तु बना दिया।

इस खोज से पता चलेगा कि ऐसे कई प्रसंग हैं, जब समाज ने जड़ पदार्थों को पूजा और श्रद्धा की वस्तु बना दिया और अपने लोगों के मानस में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे जड़ पदार्थ पवित्र हैं। ऐसी मिसालें हैं, जहां पत्थरों, नदियों, पेड़ों को देवता और देवियां बनाया गया है। ऐसी मिसालें हैं, जहां समाज ने चेतन पदार्थों को पूजनीय कर दिया है और अपने लोगों के मन में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पदार्थ पवित्र हैं। ऐसे पशुओं की मिसालें हैं, जो कबीले के गण-चिर्िं बन गए हैं। ऐसी भी मिसालें हैं, जहां समाज ने मानव-प्राणियों का पवित्रीकरण किया है और लोगों के मन में यह धार्मिक विश्वास बिठाया है कि वे पवित्र हैं। लेकिन ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जहां धर्म द्वारा किसी विशेष समाज-व्यवस्था का पवित्रीकरण किया गया हो और उसे पवित्र बनाया गया हो। आदिम जगत में कबीले और जनजाति की व्यवस्था थी। लेकिन कबीले अथवा जनजाति की व्यवस्था केवल सामाजिक व्यवस्था थी। उसका कभी भी पवित्रीकरण धर्म ने नहीं किया। न ही उसे पवित्र और अलंय बनाया। मिस्र, फारस, रोम, यूनान आदि जैसे प्राचीन विश्व के देशों में हरेक में ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी, जिसमें कुछ लोग स्वतंत्र थे तो कुछ गुलाम थे, कुछ नागरिक थे तो कुछ विदेशी थे, कुछ-एक जाति के थे तो कुछ दूसरी जाति के थे।

  1. एशियाटिक क्वार्टली रिव्यू, अप्रैल 1889, में पृ. 287 पर ‘मुहम्मद’ स प्लेस इन दि चर्च’ नामक लेख

में ई डे बुन्सेन द्वारा उद्धृत।