80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यह वर्ग-व्यवस्था भी केवल समाज-व्यवस्था थी। कभी भी उसका पवित्रीकरण धर्म ने नहीं किया। न ही उसे पवित्र और अलंघ्य बनाया। आधुनिक विश्व की अपनी व्यवस्था है। कुछ देशों में लोकतंत्र है तो कुछ देशों में फासिज्म, कुछ में नाजीवाद और कुछ में बोल्शेववाद है। यहां भी व्यवस्था केवल समाज-व्यवस्था है। धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे न तो पवित्र, और न ही अलंघ्य बनाया गया।
कहीं भी समाज ने अपने व्यवसायों, यानी रोजी-रोटी के साधनों का पवित्रीकरण नहीं किया। आर्थिक गतिविधि सदैव धार्मिक पवित्रता के दायरे से बाहर रही है। शिकारी समाज धर्मविहीन नहीं था, पर धंधे के रूप में आखेट का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। पशुचारी समाज धर्मविहीन नहीं था। लेकिन पशुचारण का धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। काश्तकारी के धंधे का भी धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र नहीं बनाया गया। सामंतवाद में भी उसके वर्ग थे। उसमें सामंत थे। कृषि दास और दास थे, पर वे विशुद्ध सामाजिक स्वरूप के थे। उस पर पवित्रता का कोई ठप्पा नहीं था।
विश्व में केवल हिंदू ही ऐसी जाति है, जिसने समाज-व्यवस्था का, यानी मानव-मानव के आपसी संबंध का, धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र, शाश्वत और अलंघ्य बना दिया। विश्व में केवल हिंदुओं की ही ऐसी जाति है, जिसने अर्थ-व्यवस्था का, यानी कामगारों के आपसी संबंध का, धर्म द्वारा पवित्रीकरण करके उसे पवित्र, शाश्वत और अलंघ्य बना दिया।
अतः यह कहना पर्याप्त नहीं है कि हिंदुओं की ही ऐसी जाति है, जिसके पास धर्म की पवित्र संहिता है। वैसी ही संहिता पारसियों, इजराइलियों, ईसाइयों और मुस्लिमों से भी है। इन सबके पास पवित्र संहिताएं हैं। वे विश्वासों और अनुष्ठानों का पवित्रीकरण करके उन्हें पवित्र बनाते हैं। पर न तो वे आदेश थोपते हैं, और न ही वे समाज-व्यवस्था के किसी खास स्वरूप का, यानी मानवों के परस्पर संबंध के किसी मूर्त रूप का, पवित्रीकरण करते हैं और उसे पवित्र तथा अलंघ्य बनाते हैं। इस मामले में हिंदू बेजोड़ हैं। इस प्रवृत्ति ने जातिप्रथा को समय के थपेड़ों तथा समय के प्रहारों को झेलने की स्थाई शक्ति प्रदान की है।
हिंदुओं जैसे संहिताबद्ध धर्मों वाले अन्य लोगों से हिंदू एक अन्य दृष्टि से भी भिन्न हैं। हिंदू धर्म-संहिता ईश्वरीय वाणी है। इसी कारण वेदों को श्रुति (जिसे सुना गया हो) कहा गया है। पारसियों, यहूदियों, ईसाइयों और मुस्लिमों को भेजी गई यह ईश्वरीय वाणी किस पर प्रकट की गई, ईश्वर की इस वाणी को किसने सुना? यहूदी कहेंगे कि इस वाणी को मूसा ने सुना, ईसाई कहेंगे कि उसे यीशु से सुना और मुस्लिम कहेंगे कि उसे मुहम्मद ने सुना। अब हिंदु से पूछिए कि वेदों में समाविष्ट ईश्वर की