86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
यदि भारत की राज्य अर्थव्यवस्था में इसका पालन किया जाता तो देश की कर देने की क्षमता बढ़ जाती जिसका फायदा सरकारी कोष के साथ-साथ आम जनता को भी होता। दुर्भाग्यवश भारत के पूंजीपतियों को यह बात समझ में नहीं आई जिसकी हानि दोनों को ही भुगतनी पड़ी।
लेकिन यदि दीर्घकालिक घाटे को पूरा करने के लिए न्यायसंगत कर प्रणाली के स्रोत बढ़ाए जाते और उत्पादक खर्चों को विनियमित किया जाता तो भी खर्चों में कटौती अथवा मितव्ययता बरतने का मार्ग मिल जाता। जैसा कि सोचा गया था 1833 में स्थापित सरकार की तरह एक शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार स्थापित हो जाती तो जहां कहीं भी संभव होता यह लाई जा सकती थी। वास्तविकता यह थी कि बहुत कमजोर किस्म का केन्द्रीयकरण किया गया। वैधानिक स्तर पर तो साम्राज्यवादी प्रशासन व्यवस्था थी लेकिन वास्तव में प्रशासन इस तरह से किया जाता था मानों कार्यकारी शासन की प्राइमरी इकाइयां प्रांत हों और भारत सरकार इनके बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला प्राधिकरण हो। यह अनेक प्रकार की परिस्थितियों से स्पष्ट था। यह सच है कि विधान निर्माण संबंधी कार्य भारत सरकार में केंद्रित था, तथापि भारत सरकार द्वारा कानून विभिन्न प्रांतों के लिए अलग-अलग पारित किए जाते थे मानों कानून निर्माण संबंधी पहल भी प्रांतों के पास ही हो और भारत सरकार मात्र अनुमति प्रदान करने वाली शक्ति हो। अपनी सार्वभौम सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रत्येक प्रांत के अपने आंतरिक तथा बाह्य रीतिरिवाज थे। प्रत्येक प्रांत के पास अपनी सेना होती थी। प्रांतों की वित्तीय स्वतंत्रता की भावनाओं को बरकरार रखने के उद्देश्य से केन्द्रीकरण के बावजूद लेखा पद्धति प्रांतीय ही बनी रही। राजस्व एकत्रित करने तथा प्रशासकीय कार्य भी प्रांतों के जिम्मेदार होने के कारण वे ऐसा व्यवहार करते थे जैसे कि कानूनी रूप से शासन की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर हो। स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने की इस भावना ने विद्रोह को जन्म दिया और खास कर बंबई तथा मद्रास सरीखे प्रांतों ने तो सैनिक विद्रोह को कुचलने के प्रयासों का विरोध तक कर डाला। स्मरणीय है कि 1833 के कानून ने वैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच
खाई बना दी। कानूनी तौर से प्रशासन की जिम्मेदारी केन्द्र (साम्राज्यवादी) सरकार पर थी लेकिन वह देश का प्रशासन नहीं चलाती थी। देश का प्रशासन प्रांतीय सरकारें चलाती थीं। लेकिन कानूनी तौर से उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी।
इस खाई से देश के वित्त की मितव्ययता पर भारी विपरीत प्रभाव पड़ा जौसा कि लाजिमी था। फिजूलखर्ची एक व्यावहारिक नियम-सा बन गया और यह साम्राज्यवादी व्यवस्था का अंतरंग हिस्सा था। मितव्ययता जिम्मेदारी से पैदा होती है और जिम्मेदारी वहां हासिल की जाती है जहां खर्चों को वहन करने की इच्छा रखने वाली सरकार स्रोतों को ढूंढ निकालने में भी निपुण हो। साम्राज्यवादी व्यवस्था लागू होने से पहले