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बजट में शामिल खर्चों के लिए पूंजी उगाहने की जिम्मेदारी प्रांतीय सरकारों पर थी। फलस्वरूप उन्हें मितव्ययी होना ही पड़ता था। लेकिन साम्राज्यवादी व्यवस्था के तहत, विभिन्न सेवाओं के लिए बजट तो प्रांतीय सरकारें बनाती थीं, खर्चों से निपटने के उपाय निकालने की जिम्मेदारी भारत सरकार पर थी। पहली व्यवस्था के तहत तो प्रांतीय सरकारों को खर्चे की सीमा का ज्ञान था लेकिन साम्राज्यवादी व्यवस्था के तहत ख्...., ‘‘उनके पास यह जानने के उपाय नहीं थे कि भारत सरकार से उन्हें कुल कितनी राशि मिल सकती है। गहराई की जानकारी न होने के कारण वे अनियंत्रित

खर्च में लिप्त थे। हर तरह उन्हें सुधार व बेहतरी की आवश्यकता दिखाई दी और उनकी लगातार यह वाजिब इच्छा रही कि साम्राज्य के सामान्य राजस्व में से अधिक से अधिक हिस्सा अपने प्रांतों को दिलवाने के लिए भारत सरकार को राजी करवा लें। अपने अनुभवों से वे जानते थे जितनी कम कटौती वे करेंगे और जितनी अधिक उनकी मांग होगी उतना ही अधिक वे अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए भारत सरकार को मना लेंगे। उन्होंने महसूस किया कि इन जरूरतों को पेश करने के लिए उन्होंने जो कुछ किया वह ठीक था और आवश्यक उपाय करने से मना करने की जिम्मेदारी उन्होंने भारत सरकार पर छोड़ दी।’’ ख्1,

प्रायः भारत सरकार को इन अनाप-शनाप मांगों के दबाव में झुकना पड़ता था क्योंकि लंबे समय तक उसके पास वह व्यवस्था (मशीनरी) नहीं थी जिससे मांगों तथा उन पर होने वाले खर्चों पर नियंत्रण की जानकारी ली जा सके। साम्राज्यवादी प्रशासनिक व्यवस्था से बहुत अधिक कार्यकुशलता की आशा करना सामान्य बात नहीं है और ऐसे में तो बिल्कुल भी नहीं जब इसकी जिम्मेदारी एक विभाग अथवा प्रांत तक सीमित न होकर पूरे महाद्वीप के बराबर देश की प्रशासनिक व्यवस्था संभालने की हो। केवल विशाल होने के कारण ही यह चलने में धीमा है। यदि यह व्यवस्था भारतीय व्यवस्था के समान असंगठित होती तो इसकी रफतार और भी धीमी होती। सर्वप्रथम, भारत में केन्द्रीय व्यवस्था अपने नियंत्रण करने वाले हिस्सेµ कार्यकारिणीµके बिना कार्य कर रही थी। इसका निर्माण करने वाले कानून ने भारत सरकार और बंगाल सरकार को एक करके भारी भूल की होगी। इस विलय के बाद सरकारी तंत्र पर दबाव बढ़ गए। बंगाल सरकार की हैसियत से कार्यों को निपटाने के बाद इतना समय ही नहीं बचता था कि यह भारत सरकार के रूप में अपने कार्यों का निर्वाह कर सके। दोनों सरकारों की न केवल कार्यकारिणी ही एक थी बल्कि दोनों सरकारों के कार्यों की देखरेख के लिए सचिवालय भी एक ही था। कार्यों के बोझ से पहले से ही दबे सचिवालय की 1843 तक देश के वित्त का प्रबंध कर रहे विशेष अधिकारी के अभाव में कार्यकुशलता बहुत कम हो गई।

  1. द एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ द अर्ल ऑफ मेयोः एज वायसराय एंड गवर्नर जनरल ऑफ इंडियाµभूतपूर्व गवर्नर

जनरल और परिषद् के सदस्य जान स्ट्रेची द्वारा कार्यवाही के अंश, दिनांक 30 अप्रैल 1872, राजकीय

मुद्रण अधीक्षक का कलकत्ता स्थित कार्यालय, 1872, पृष्ठ 46।