1 साम्राज्यवादी व्यवस्था : इसका विकास और ह्रास - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1843 में भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड एलनबरो ने बंगाल सरकार के सचिवालय को भारत सरकार ख्1, के सचिवालय से अलग कर दिया तथा इसे वित्त सचिव के नाम से एक अलग कार्यालय से संलग्न कर दिया। ख्2, इस कार्यालय का काम केवल वित्त विभाग से ही सम्बद्ध था। लेकिन जबकि वित्त सचिव की नियुक्ति ने जांच अधिकारी की आवश्यकता पूरी कर दी फिर भी विनियोग बजट तथा लेखा परीक्षा एवं लेखाओं की केन्द्रीय व्यवस्था के अभाव में वित्त सचिव के लिए खर्चों में कटौती कर पाना संभव नहीं हो सका। केन्द्रीय वित्त व्यवस्था की स्थापना के बावजूद लेखा परीक्षा एवं लेखा विभाग के अधिकारी विभिन्न प्रांतों के सचिवालयों से ही सम्बद्ध रहे। वे सर्वोच्च सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं थे जबकि कानून भारत के राजस्व के प्रबंध और आदेश की जिम्मेदारी सर्वोच्च सरकार पर ही थी। प्रांतीय सचिवालय से संलग्न होने के कारण लेखा एवं लेखा परीक्षा संबंधी आदेश भारत सरकार को संबंधित प्रांतीय सरकार के अनुसार एवं उसी के माध्यम से जारी करने पड़ते थे। दूसरी ओर, यद्यपि बजट की व्यवस्था, व्यापारिक खातों यानी रिकॉर्डों के लिए तो अच्छी थी लेकिन सभी अच्छे राज्य खातों, यानी जांच पड़ताल के सर्वप्रथम एवं प्रारंभिक उद्देश्य के लिए बेकार थी। वास्तव में देश के वित्तीय प्रशासन के उद्देश्य से तीन अनुमान (खाका, स्थाई और बजट) तैयार किए गए थे जिनमें विभिन्न सेवाओं में से प्रत्येक के लिए आवश्यक धन राशि का लेखा-जोखा दिखाया गया था। लेकिन विभिन्न सेवाओं पर सार्वजनिक धन का यह आबंटन विनियोग नहीं माना गया। इसे रोकड़ आवश्यकताएं ही माना गया। इस वास्तविकता के कारण कभी भी अनुदान ठीक ढंग से नहीं तैयार किए गए, और न ही उन पर लगाई गई सीमा का व्यवहार में अनुसरण किया गया चूंकि प्रत्येक सेवा के लिए विशिष्ट स्वीकृति का कोई बजट नहीं था। लेखा परीक्षा एवं लेखा विभाग ने स्वयं को सरकारी कोष में आने वाली और खर्च होने वाली राशि के हिसाब-किताब तक ही सीमित कर लिया था। यह स्पष्ट है कि विनियोग बजट के अभाव में सभी राज्यों के लेखा परीक्षा तथा लेखा विभाग का खर्च करने वाली शक्तियों द्वारा स्वीकृत राशि के भीतर ही खर्च करने की जांच करने का मुख्य उद्देश्य पूरा नही हो सका। अत्यधिक मांग करने के साथ-साथ प्रांतीय सरकारें खर्चें के मामले में भी गैर-जिम्मेदार थीं। जब तक भारत सरकार के पास विनियोग बजट और लेखा-परीक्षा तथा लेखा-विभाग की केन्द्रीय व्यवस्था नहीं थी तब तक वित्त नियंत्रण के मामले में इसकी शक्ति नाममात्र की ही थी, और कानूनी रूप से वित्तीय मामलों में कमजोर स्थिति हासिल होने के बावजूद वास्तव में प्रांत सबसे शक्तिशाली थे। प्रांतीय सरकारों की वित्तीय गैर-जिम्मेदारी और केन्द्रीय

  1. भारत सरकार का प्रस्ताव, गृह विभाग, 29 अप्रैल, 1843

  2. भारत सरकार का प्रस्ताव, 4 जनवरी, 1843