साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 89
सरकार की अकर्मण्यता के चलते प्रांतीय सरकारों की खर्चीली आदतों को रोकने में असमर्थ केन्द्र सरकार की स्थिति के साथ-साथ वित्तीय मामलों में भारत सरकार की कार्यकारिणी परिषद् द्वारा बरती गई उदासीनता भी कम जिम्मेदार नहीं थी। यह सच था कि कार्यकारिणी परिषद् की विशिष्ट अनुमति के बिना भारत सरकार के राजस्व में से कुछ भी खर्च नहीं किया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं लगता कि परिषद् ने अपनी गतिविधियों के द्वारा खर्चों में मितव्ययता लाने के कोई विशेष प्रयास किए। परिषद् सामूहिक रूप से कार्य करती थी, और इसके सदस्यों के बीच किसी तरह का कार्य आबंटन नहीं था। युद्ध एवं विधेयक विभाग को छोड़कर बाकी सभी सरकारी काम गवर्नर जनरल तथा उनके काउन्सलर्स (पार्षदों) के समक्ष पेश किए जाते थे। सामूहिक कार्यशैली के परिणामस्वरूपः
‘‘वास्तव में प्रत्येक विवाद महागनी की लकड़ी से बने छोटे बक्सों में रख कर
एक पार्षद के घर से धीमी रफतार से दूसरे पार्षद के घर पहुंचता हुआ प्रत्येक
पार्षद के हाथों से गुजरता था।’’ ख्1,
इन परिस्थितियों में खर्चों में मितव्ययता बरतने के लिए कोई भी वित्त मंत्री (चांसलर ऑफ एक्सचेकर) नहीं था हालांकि सभी स्वयं को खजाने का मालिक ही समझते थे। परिणामस्वरूप वित्त मंत्री सभी की जिम्मेदारी बन जाने की वजह से किसी की भी जिम्मेदारी नहीं बन पाया। इसका परिणाम यह हुआ कि निधियों का आबंटन सेवाओं की वास्तविक आवश्यकताओं के हिसाब से नहीं हो पाया बल्कि जरूरतों को लेकर शोर मचाने के हिसाब से करना पड़ा।
यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं कि साम्राज्यवादी व्यवस्था की असफलता एक दोषपूर्ण वित्तीय व्यवस्था के कारण थी जिसमें कठोर कर प्रणाली और फालतू तथा अव्यवहारिक, अनियमित खर्चे निहित थे। हालांकि ऐसा नहीं माना जाना चाहिए कि यह दोषपूर्ण वित्तीय नीति साम्राज्यवादी व्यवस्था के लागू होने के साथ ही शुरू हो गई थी। दूसरी ओर यह पुरानी धरोहर थी जो साम्राज्यवादी व्यवस्था को विरासत में मिली थी। फिर भी यह स्पष्ट है कि वित्तीय नीति की सामयिक समीक्षा और केन्द्रीय नियंत्रण की मजबूती ने साम्राज्यवादी (केन्द्रीय) व्यवस्था के आधार को अधिक मजबूत बनाया होता। लेकिन इस का लंबी अवधि तक चलना इसके वित्तीय आधार के लिए घातक सिद्ध हुआ और चूंकि बढ़ते खर्चों की पूर्ति के लिए यह उन लोगों से जिनकी दरिद्रता इतने दूर की थी, और अधिक पैसा नहीं उगाह सकी तो साम्राज्यवादी व्यवस्था सैनिक विद्रोह के सामने चरमरा उठी, और दोबारा अपनी मूल स्थिति में नहीं लौट पाई।
- डब्ल्यू डब्ल्यू हंटर, लाइफ ऑफ मेयो, खंड-1, पृ. 190