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साम्राज्यवाद बनाम संघवाद

सन् 1857 के सैनिक विद्रोह (गदर) के फलस्वरूप खस्ताहाल केन्द्रीय वित्त व्यवस्था की स्थिति इतनी अधिक बिगड़ गई कि आगामी दशक के दौरान जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों के समक्ष जर्जर होती व्यवस्था को पुनर्वासित करने से बड़ी कोई अन्य समस्या नहीं थी। हालांकि अपनाए जाने वाले सही तरीके को लेकर लंबा विवाद चला लेकिन व्यवस्था के धराशायी होने के कारण इतने स्पष्ट थे कि भारतीय वित्त से संबंधित सभी पक्ष जर्जरप्राय व्यवस्था के एकमात्र सर्वोच्च दोष पर सहमत थे और यह दोष था व्यवस्था द्वारा प्रांतीय सरकारों को मनमाना खर्च करने के लिए उत्साहित करना। इस दोष को दूर करने के लिए एक स्तर पर कुछ जिम्मेदार अधि कारियों द्वारा कोशिश की गई थीःµ

‘‘भारतीय वित्त की मिश्रित पूंजी में स्थानीय सरकारों की हिस्सेदारी बनाने और

इस प्रकार भारत सरकार में उनकी रुचि और सहयोग पैदा करने के बजाए उन्हें

ऐसा एजेंट तथा कर्मचारी बनाया जाए जिनमें व्यय में कटौती करने की अभिलाषा

न हो तथा जो अपने मालिकों के स्रोतों का सहारा लेकर दूसरों को दिए गए

फिजूलखर्ची के अधिकारों से तुलना करते हुए अपनी मांगों को लगातार बढ़ाने

के बारे में ही सोचते रहें। ख्1, ’’

इस विचार ने धीरे-धीरे प्रांतों को अलग और संप्रभु राज्यों में परिवर्तित करके एकीकृत भारत को भारत के एकीकृत राज्यों ख्2, में परिवर्तित करने के सामूहिक विचार का रूप ले लिया। इसका उद्देश्य साम्राज्यवादी व्यवस्था के स्थान पर संघीय व्यवस्था स्थापित करना तथा भारत में केन्द्रीय सत्ता की वित्तीय स्थिति को एकीकृत राज्यों की

  1. स्थानीय सरकारों की वित्तीय शक्तियों के विस्तार पर मुख्य सेनानायक महामहिम सर डब्ल्यू. आर. मेसफील्ड

द्वारा नोट किए गए क्रियाकलापों के अंश दिनांक 17 अक्तूबर, 1867, पृष्ठ 99-103 2. जे.एफ. फिनलेज हिस्टरी ऑफ प्रोविंशियल फाइनेंसिंग अरेंजमेंट में कर्नल आर. स्ट्रेची की दिनांक

17 अगस्त 1867 की टिप्पणी। लिस्ट ऑफ एक्सट्रेक्टस, पृष्ठ 3