साम्राज्यवाद बनाम संघवाद 91
केन्द्रीय शक्ति के साथ मिलाना था। संघीय योजना के क्रियान्वयन के लिए प्रार्थना की गई कि भारत के राजस्व को साम्राज्यवादी कोष में जमा करवा कर विभिन्न प्रांतीय सरकारों को बांटी जाने वाली एकमुश्त राशि नहीं समझा जाना चाहिए। योजना के अनुसार, प्रत्येक प्रांत को अपने राजस्व को स्वयं रखने और उनसे अपने खर्चों की पूर्ति करने का अधिकार प्राप्त होना था। केन्द्र सरकार को अपने अलग स्रोत रखने का प्रावधान था, और जरूरत पड़ने पर किसी समान स्तर पर आधारित केन्द्र सरकार के व्यय में प्रांतों के हिस्से के रूप में प्रांतों से सहयोग राशि भी ली जा सकती थी। इस तरह संघीय योजना के तहत साम्राज्यवादी और प्रांतीय औपचारिक विभाजन वाले एकीकृत साम्राज्यवादी बजट को सेवाओं और राजस्व आबंटन के वास्तविक विभाजन पर आधारित अलग-अलग केन्द्रीय तथा प्रांतीय बजटों से प्रतिस्थापित करना था।
संघीय योजना के पक्ष में अनेक लाभ गिनवाए गए। सर्वप्रथम यह विश्वास जाहिर किया गया कि राजस्व तथा सेवाओं का पृथकीकरण केन्द्रीय तथा प्रांतीय सरकारों के तौर तरीकों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करेगा ताकि प्रत्येक सरकार आबंटित निधियों की सीमाओं के भीतर ही अपने क्रियाकलापों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार रहेगी। इसके बाद से प्रांतीय सरकारों को अपनी आमदनी और खर्च का अनुमान अलग-अलग भेजना होगा, और उन्हें समायोजित करने का काम सर्वोच्च सरकार द्वारा इसे भेजे गए विभिन्न प्रांतीय अनुमानों के औसत के आधार पर किया जाएगा। संघीय योजना के तहत प्रांतीय अनुमानों की आय और व्यय का समायोजित हिसाब-किताब होता था। यद्यपि यह प्राथमिक था फिर भी संघीय योजना के पक्षधर केवल इसे ही योजना का फायदा नहीं मानते थे क्योंकि इसका फायदा न केवल स्थानीय सरकारों द्वारा निकाली जाने वाली निधियों को नियंत्रित करके उनकी फिजूलखर्ची पर अंकुश लगाने का कदम था, बल्कि साथ ही केन्द्र सरकार की फिजूलखर्ची पर भी लगाम लगाने का कदम था। संघीय व्यवस्था पक्षधरों ने यह सत्य कभी नहीं छिपाया कि संपूर्ण भारत के कुल स्रोतों को दुहने का अधिकार रखने वाली केन्द्र सरकार भी फिजूलखर्ची करने से नहीं कतराती थी। अतः उन्होंने सोचा कि राजस्व और सेवाओं का बंटवारा करने वाली संघीय योजना केन्द्र तथा राज्य सरकारों को कम खर्च करने के लिए बाध्य करेगी।
संघीय योजना के पक्षधरों ने केवल मितव्ययता और जिम्मेदारी लाने के लिए ही संघीय योजना का प्रस्ताव नहीं किया था बल्कि इसकी बहुलता के लिए भी इस योजना की तरफदारी की थी। संघवादियों ने इस बात से इनकार किया कि राज्य के बढ़ते खर्चों की पूर्ति के लिए भारत के पास राजस्व के अधिक स्रोत नहीं हैं। यद्यपि भारतीय वित्त व्यवस्था डांवाडोल थी लेकिन उनके विचार में कर लगाने के इतने स्रोत हैं जिनको इस स्थिति पर नियंत्रण किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने तर्क दिया कि इन उपलब्ध स्रोतों का उपयोग नहीं किया गया क्योंकि साम्राज्यवादी