92 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार इन स्रोतों का उपभोग कर सकती थी लेकिन उनकी स्थानीय प्रकृति के कारण वह ऐसा नहीं कर सकी, और प्रांतीय सरकार जो उनकी स्थानीय प्रकृति के कारण उनका इस्तेमाल करना चाहती थी, वर्तमान संवैधानिक कानून के तहत ऐसा नहीं कर सकी। लेकिन यदि प्रांतीय सरकारों में कर लगाने की शक्तियां निहित होतीं, जैसा कि संघीय योजना के तहत होता है तो पूरे भारतीय वित्त के फायदे के लिए कर के जो स्रोत क्षेत्रीय प्रकृति के कारण केन्द्र सरकार द्वारा इस्तेमाल न किए जा सके प्रांतीय सरकार द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते थे।
संघवाद की वकालत न केवल मितव्ययता और बहुलता की दृष्टि से बल्कि समानता की दृष्टि से भी की गई थी। ऐसा माना गया कि चालू व्यवस्था में विभिन्न प्रांतों के साथ समान बर्ताव नहीं किया गया है।
यदि हम प्रांतीय उपयोगिता के लोक निर्माण कार्यों और विभिन्न प्रांतों में उन पर हुए खर्चों की कसौटी माने तो संघवादियों की आलोचना में दम नजर आता है। दूसरी ओर, निम्नलिखित आंकड़े तर्कों की बहुत हद तक पूर्ति करते हैंःµ
लोक निर्माण कार्यों पर व्यय
1837-38 से 1845-46 वर्षों का औसत
| izkar | tula[;k | {ks=kiQy oxZ ehy esa |
jktLo lSadM+k esa (#-) |
yksdfuekZ.k dk;ksZa ij [kpkZ lSadM+ksa esa (#-) |
|---|---|---|---|---|
| caxky mÙkj&if'peh izkar enzkl |
4]00]00]000 2]32]00]000 2]20]00]000 |
1]65]443 71]985 1]45]000 |
1]02]39]500 56]99]200 50]69]500 |
1]79]812 1]41]450 30]300 |
कलकत्ता रिव्यू, 1851 से संकलित, अंक, 16, पृष्ठ 466
इस प्रकार बंगाल में लोक निर्माण कार्यों पर खर्च उनकी आमदनी का 1 - प्रतिशत था, उत्तरी पश्चिमी प्रांतों में 2 ½ प्रतिशत और मद्रास में ½ से कुछ अधिक था। केन्द्रीय सरकार द्वारा कुछ प्रांतों की तुलना में दूसरे प्रांतों के साथ किया गया वह पक्षपात इस आधार पर न्यायोचित ठहराया गया कि उन राज्यों ने अपने खातों में बचत दर्शायी थी, लेकिन संघवादियों का कहना था कि विभिन्न प्रांतों द्वारा दिखाए गए बचत और घाटे काल्पनिक थे। वे गलत लेखा पद्धति का परिणाम थे। यह पद्धति गलत थी। क्योंकि इसके तहत देश के वित्तीय लेन-देन का हिसाब-किताब