साम्राज्यवाद बनाम संघवाद 93
विभिन्न मदों के खातों में न करके प्रांतों के आधार पर किया जाता था जैसा कि वित्त की सामान्य पद्धति के अभाव में 1833 के पूर्व किया जाता था। 1833 का कानून पास होने के पश्चात् लेखा की यह पद्धति कानून की आत्मा के खिलाफ हो गई थी। इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता यदि खातों के सामान्य मदों में सम्पूर्ण भारत के मदों को प्रांतीय मदों से अलग कर लिया गया होता। इस प्रावधान के अभाव में पूरे देश की सेवाओं पर हुए व्यय प्रांत के खातों में शामिल कर दिए जाने से व्यवस्था के दोष अधिक बढ़ गए। इसका परिणाम यह हुआ कि उस प्रांत विशेष के खाते घाटे ही दिखाते रहे जबकि दूसरे प्रांत बचत दिखाते रहे और फलस्वरूप पक्षपातपूर्ण व्यवहार पाते रहे। संघवादियों के समक्ष बंबई प्रांत का उदाहरण मौजूद था। इस प्रांत की मांगों को भारत सरकार लगातार कम महत्त्व देती रही क्योंकि अपने इतिहास में बंबई ने बहुत कम अवसरों पर ही अपने खातों में बचत दिखाई थी। लेकिन यदि यह महसूस कर लिया जाता कि प्रदेश का घाटा लेखा की उस जंगली व्यवस्था के कारण है जिसके तहत प्रदेश को भारतीय नौसेना का खर्च वहन करना पड़ता था तो निश्चय ही प्रदेश की स्थिति बेहतर रही होती। नियुक्ति के ऐसे भ्रष्ट तरीके ही केवल लेखा व्यवस्था के दोष नहीं थे। इसके तहत यह आम बात थी कि किसी एक सेवा पर हुआ खर्च एक प्रांत से लिया जाता था और उसे दूसरे प्रांत के खाते में जोड़ दिया जाता था। लेखा की गलत पद्धति के कारण किस तरह मद्रास प्रदेश के खातों में पाए गए घाटे को उस पर लाद दिया गया, यह निम्न चार्ट से स्पष्ट हैःµ
| lsuk ds vf/dkj okys {ks=k ij [kpZ | lsuk ds vf/dkj okys {ks=kksa ls vk; |
|---|---|
| uke esa Mkyh x;h jkf'k |
tksM+h x;h jkf'k |
| enzkl 79]83]000 |
cacbZ 20]00]000 caxky 1]04]22]870 |
(उपरोक्त से संकलित, पृष्ठ 475)
लेखा की इस पद्धति में निहित असमानता को दृष्टि में रखते हुए इस बात में कोई शंका नहीं है कि संघवादियों द्वारा अपनी योजना के लाभ गिनवाना न तो काल्पनिक था और न ही संकीर्ण। चालू अव्यवस्था की तुलना में संघीय तथा प्रांतीय सरकारों के बीच कार्यों का बंटवारा स्वयं में लाभकारी होता। और यदि यह समानता