2 साम्राज्यवाद बनाम संघवाद - Page 109

94 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

न भी थी तब भी इसमें समानता का रास्ता खोलने में उसका योगदान तो था ही।

जब एक व्यावहारिक प्रस्ताव के रूप में संघीय योजना को अधिकारियों के समक्ष रखा गया तो इसका कड़ा विरोध किया गया। साम्राज्यवादी व्यवस्था के समर्थकों, जो मुख्यतः नागरिक सेवाओं में लगे सैनिक थे, ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया। संघीय व्यवस्था के खिलाफ उन्होंने दो तरफा मोर्चा खोल दिया। यह मोर्चा योजना की व्यावहारिकता और कार्य कुशलता को लेकर खोला गया।

साम्राज्यवादियों ने सवाल उठाया कि क्या भारत की आमदनी और खर्चों को किसी एक विशेष प्रांत से संबंध बता कर उसका स्थानीयकरण किया जा सकता है? उनका कहना था किःµ

‘‘भारत में ब्रिटिश शासन आरंभ होने के साथ ही ख्......, प्रेसीडेंसियों और प्रांतों के हित एवं रुचियाँ एक दूसरे से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अब अलग करना असंभव है। ऐसा तभी हो सकता है जब परिवर्तन किए जाएं लेकिन ये परिवर्तन चालू व्यवस्था में निहित परेशानियों से कहीं बड़ी परेशानियां पैदा कर देंगे। बंगाल प्रेसीडेंसी की सेना गंगा के निचले तटों पर स्थित संपन्न जिलों में नहीं बल्कि मुख्यतः पंजाब के अभावग्रस्त जिलों में तैनात है। इस तरह रखी गई सेना वास्तव में पूरे प्रदेश को सुरक्षा प्रदान करती है। मद्रास की सेना प्रेसीडेंसी के भीतर नहीं रखी जाती बल्कि दक्कन, सेंट्रल प्रोविंसिज और ब्रिटिश बर्मा की भी सुरक्षा करती है। इसी प्रकार बंबई की सेना बंबई के अतिरिक्त राजपूताना और मालवा राज्यों की सुरक्षा भी करती है। निचले प्रांत अथवा बंगाल खास स्वयं में सम्पन्न है लेकिन अपने राजस्व के अलावा आंशिक रूप से उनके लेकिन मुख्य रूप से बंगाल प्रदेश के दूसरे हिस्सों के सीमा-शुल्क उन्हें मिलते हैं। यहां तक कि बंगाल की अफीम भी पूरी तरह से बंगाल की नहीं है, उसका एक बड़ा हिस्सा उत्तर पश्चिमी प्रांतों में उगाया जाता है। कड़े शब्दों में कहा जाए तो बम्बई प्रांत में भी अफीम से मिला राजस्व उस प्रांत को बिल्कुल नहीं मिलता क्योंकि यह उन सीमा क्षेत्रों में पैदा की जाती है, जिन्हें अगर किसी प्रदेश में शामिल किया जाए तो वह बंगाल का हिस्सा बनेगा। बंबई और मद्रास में लगाए गए कुछ नमक कर उस नमक की खेप पर लगाए जाते हैं जिसकी खपत मध्य भारत में होती है और इस तरह यह आय वास्तव में भारत सरकार के खाते में जानी चाहिए। और भी उदाहरण दिए जा सकते हैं, लेकिन यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि यदि वित्त के सम्पूर्ण स्थानीयकरण के दृष्टिकोण से इन मामलों को समायोजित करने का प्रयत्न किया जाए तो अनेक परेशानियां, यहां तक कि विवाद भी पैदा हो जाएगा ख्1..., ’’

  1. सर रिचर्ड टेम्पिल का नवम्बर 7, 1868 का टिप्पण, स्थानीय सरकारों की वित्तीय शक्तियों के विस्तार

से संबंधित पर्चे आदि. पृ. 197-208