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साम्राज्यवाद बनाम संघवाद 95

इसी तर्ज पर तर्क पेश करते हुए भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड लारेंस ने लिखा हैःµ

‘‘अनुभव बतलाता है कि ब्रिटिश भारत के स्रोतों को समेकित रूप में माना जाना ज्यादा सुविधाजनक है न कि उस प्रांत के संदर्भ में जिससे उसे उगाहा गया है। यदि नियम इसके विपरीत होते तो हम विवाद में पड़ जाते कि किन-किन राजस्वों की मांग प्रत्येक प्रांत कर सकते हैं? खर्चे के वे कौन से मद हैं जिन्हें प्रत्येक प्रांत से उगाहा जा सकता है? उदाहरणस्वरूप क्या सफाई के रख रखाव के लिए पहाड़ों में तैनात ब्रिटिश सेना का खर्चा पंजाब से वसूला जा सकता है? क्या इसी तरह उत्तर पश्चिमी सीमाओं में तैनात सेना का खर्चा वसूला जा सकता है? क्या राजपूताना राज्य में तैनात बंबई प्रेसीडेंसी की सेनाओं का खर्चा बंबई प्रेसीडेंसी से वसूला जा सकता है या फिर किस तरह उनका खर्चा वसूला जा सकता है? या दूसरी ओर इनसे कहा जा सकता है कि क्यों नहीं बंगाल जिसके पड़ोस में कोई विदेशी ताकत नहीं है और जिसकी जनसंख्या आलसी और डरपोक है। अतः जिसे न्यूनतम सेना की जरूरत हैःµ को उसकी बचत का फायदा मिलना चाहिए? या फिर इसके विपरीत क्यों नहीं बंगाल को केन्द्रीय भारत, पंजाब और उत्तर पश्चिमी प्रांतों में तैनात सेना जो पूर्व रोहिला, मराठा और पिण्डारियों के आक्रमण से उसकी रक्षा करती है, पर होने वाले खर्च का अपने हिस्से का खर्च वहन करना चाहिए? यदि प्रत्येक प्रांत अपनी अलग वित्तीय व्यवस्था चाहता है तो इन प्रश्नों का जवाब देना होगा।’’ ख्1, और उनकी नजर में इस सवाल का जवाब मुश्किल था।

लेकिन साम्राज्यवादी इससे भी आगे गए और उन्होंने तर्क पेश किया कि यदि आमदंनी और खर्चों को प्रांतीय तथा केन्द्रीय भागों में विभाजित करना संभव है तो भी ऐसा करना उचित नहीं था।

उन्होंने तर्क पेश किया कि चालू वित्तव्यवस्था के तहतःµ

‘‘संपूर्ण भारत के वित्तीय स्रोतों का निपटारा करने वाली साम्राज्यवादी सरकार उन स्रोतों को वहां पहुंचा सकती है जहां उनकी अत्यधिक आवश्यकता है। कुछ ऐसे विषय हैं जो राष्ट्र के लिए महत्त्वपूर्ण हैं भले ही वे मुख्यतः किसी विशेष जिले के लिए लाभकारी लगते हों। विशेष जिलों में दोष, जरूरतें और खतरे हो सकते हैं, जिन्हें दूर करना और ठीक करना सर्वोच्च सरकार की जिम्मेदारी है। किसी हिस्से का निर्माण अथवा सुधार राष्ट्रीय महत्त्व का हो सकता है यद्यपि इस पर खर्च करना किसी विशेष स्थानीय क्षेत्र के लिए अनुचित रूप से लाभकारी लगे। एक सड़क,

  1. दिनांक 22 नवंबर, 1867 के अंश, पृष्ठ 104-7