2 साम्राज्यवाद बनाम संघवाद - Page 111

96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

एक नहर, कपड़ा व काफी अथवा चाय पैदा करने वाले जिले से एक रेलवे लाइन समस्त लोगों और भारत के व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है, और फिर भी इस कार्य पर आया खर्च उस जिले की आय से कहीं अधिक हो सकता है ख्...., या नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्य के लिए, सर्वोच्च सरकार हाल में जीते हुए, बर्बाद अथवा असंतुष्ट प्रांतों पर खतरों के कारणों को ढूंढ़ने की दृष्टि से उन प्रांतों की आय से अधिक खर्च करने का निर्णय ले और उन प्रांतों को साम्राज्य के शासित क्षेत्रों के साथ मिल कर रहने को बाध्य करे, ख्...., साम्राज्य के पुराने प्रांत नए प्रांतां पर कब्जा करें। पुराने प्रांत जीते हुए प्रांतों को नागरिक सभ्यता दिखाने को बाध्य हैं। किसी देश को जीत कर उसे अपने स्रोतों के भरोसे छोड़ने का हमें कोई अधिकार नहीं है। विजय अधिकारों के साथ-साथ कर्त्तव्यों की हिमायती भी है।’’

मद्रास परिषद् के अध्यक्ष लार्ड नेपियर ऑफ मार्किस्टन ने लिखाः µ ‘‘मैं आपत्ति के साथ उन लोगों की नीति के बारे में कहना चाहता हूं जो सर्वोच्च सरकार के फायदों को उसकी आय के साथ जोड़ना चाहते हैं और जो क्षेत्रीय भावना के तहत आय के हिसाब से प्रांतों को आबंटन देना चाहते हैं। इसके विपरीत गरीब प्रांतों की मदद करना अमीर प्रांतों के लिए संतोष का विषय होना चाहिए, जवान की रक्षा करने में बूढ़े को, बुरे को ठीक करने में अच्छे को संतोष होना चाहिए क्योंकि इसी तरह एकीकृत भारत के गौरवपूर्ण निर्माण में सभी सहयोग दे सकते हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति एक ऐसी केन्द्र सरकार के गठन से हो सकती है जो पूरे साम्राज्य के वित्तीय स्रोतों का बंटवारा करे।’’ ख्1,

यह स्पष्ट है कि उपरोक्त साम्राज्यवादियों का तर्क अथवा उपदेश उनका ध्येय पूरा करने में कभी सहायक नहीं होते। आय और खर्च को प्रांतीय तथा केन्द्रीय भागों में विभाजित करने की दिक्कत पर जोर देने के बावजूद यह स्वीकार किया जा सकता है कि यह कार्य उतना मुश्किल नहीं था जितना साम्राज्यवादियों ने दिखाने का प्रयत्न किया। सेना पर आने वाले खर्चों को समाहित करने की दिक्कत आसानी से सेना का केन्द्रीकरण कर केन्द्र सरकार के हवाले करके हल की जा सकती थी। इसी तरह उन सभी सेवाओं को जो प्रेसीडेंसी अथवा प्रांत को दी जाती थी, लेकिन जो पूरे साम्राज्य के लिए फायदेमंद थी, केन्द्र सरकार के बजट में आसानी से शामिल किया जा सकता था। इसी प्रकार राजस्व के चालू स्रोतों को आसानी से केन्द्र और स्थानीय सरकारों के बीच बांटा जा सकता था। केन्द्र सरकार अपने इस्तेमाल के लिए राजस्व के उन स्रोतों को रोक सकती थी जो एक प्रदेश की सीमाओं के व्यक्ति तक जाते थे या जिसकी अधिकतम आय देश भर में लागू सार्वभौम प्रशासन पर आधारित थी।

  1. उनके द्वारा नोट किए अंश दिनांक 15 फरवरी, 1868, पैरा-9, पृ. 186-90