साम्राज्यवाद बनाम संघवाद 97
दूसरी ओर प्रांतीय सरकारों को उन स्रोतों के अधिग्रहण की अनुमति दी जा सकती थी जो स्थानीय प्रकृति के थे और जिनकी आमदनी स्थानीय सतर्कता पर निर्भर थी। उदाहरण के लिए सीमा शुल्क को आसानी से केन्द्रीय स्रोत बनाया जा सकता था, केवल इसलिए नहीं कि उसका क्षेत्र व्यापक था, बल्कि इसलिए कि उनके लिए एक सामान्य तथा सार्वभौम वैधानिक स्रोत माना जा सकता था और नमक राजस्व को भी केन्द्रीय स्रोत किया जा सकता था। यह सही है कि राजस्व के स्रोतों का इस प्रकार बंटवारा करना संभव नहीं है कि विभिनन सरकारों के खर्चे की पूर्ति के लिए उचित स्रोत प्राप्त हो सकें। प्रांतों द्वारा केन्द्र सरकार को और केन्द्र द्वारा प्रांत सरकारों को कुछ राशि देकर निधियों का समायोजन लाजिमी था। राजस्व के अधिग्रहण अथवा खर्चों के मामलों में कमोबेश निरंकुश सिद्धांतों को अपनाए जाने से रोकना भी संभव नहीं हो पाता। लेकिन साम्राज्यवादी बजट को केन्द्रीय तथा अनेक प्रांतीय बजटों में विभाजित करने की समस्या में आने वाली परेशानियों और निरंकुशता को स्वीकार करते हुए यह फिर भी कहा जा सकता है कि इस विवाद का संतोषजनक हल किया जा सकता था। साम्राज्यवादियों द्वारा दी गई चुनौती को स्वीकार करते हुए कर्नल चेजनी ने खर्चों के चालू मदों को केन्द्रीय और प्रांतीय भागों में बांटने का उल्लेखनीय साहस किया। उन्होंने अपनी पुस्तिका इंडियन पालिटी में कहा हैःµ
‘‘केन्द्रीय खर्चों के वे मद जिनके लिए सहयोग की आवश्यकता होगी वे निम्न प्रकार के हैंःµ
गृह प्रतिष्ठान और भारत सचिव द्वारा किए गए खर्चे,
भारतीय ऋण पर ब्याज
भारत सरकार के प्रतिष्ठान
राजनयिक प्रतिष्ठान
सेना
साम्राज्यवादी सेवाएं µ डाकघर तथा तार विभाग
रेलवे की पूंजी पर ब्याज की गारंटी इनमें इसको भी जोड़ा जाना चाहिए।
कुछ निर्धन प्रांतों को सहायता अनुदान (वे प्रांत जो अभी अपने खर्चों का
भुगतान नहीं करते)’’
इससे तथा अन्य प्रयासों से साम्राज्यवादी आश्वस्त हो गए कि व्यवहार की दृष्टि से उनके तर्क असफल रहेंगे। परिणामस्वरूप उन्होंने व्यावहारिकता के तर्क के स्थान पर कार्यकुशलता पर जोर देना शुरू कर दिया। कार्यकुशलता के तर्क ने संघीय योजना पर आक्रमण करने के लिए एक बेहतर हथियार मुहैया करा दिया था। क्या एक